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नीचे आई महंगाई

खराब खबरों से जूझते नागरिकों के लिए अच्छी खबर यह है कि जो हफ्ता 26 नवंबर को खत्म हुआ, उसमें खाद्य पदार्थो की महंगाई की दर घटकर 6.60 प्रतिशत पर आ गई। इसके पिछले हफ्ते में वह आठ प्रतिशत थी और पिछले लगभग दो साल से 10 प्रतिशत के आसपास मंडरा रही थी। कुल जमा महंगाई की दर अब भी ऊंची है, लेकिन खाद्य पदार्थो की महंगाई की दर विशेष रूप से जनता और सरकार को सता रही थी। रिजर्व बैंक ने पिछले लगभग पौने दो साल में 13 बार इस उम्मीद में ब्याज दरें बढ़ाई थीं कि इससे महंगाई काबू में आ जाए। जानकारों का मानना यह था कि महंगाई खाद्य पदार्थो की मांग के मुकाबले कमी की वजह से है, इसलिए मौद्रिक उपायों से कुछ नहीं होगा। मौद्रिक नीति का असर महंगाई पर तो क्या हुआ, उसने औद्योगिक उत्पादन पर बुरा असर डाला और देश की वार्षिक विकास दर 6.9 प्रतिशत तक आ गई। खाद्य पदार्थो की मांग और आपूर्ति का गणित अगर बिगड़ जाए, तो वह आसानी से नहीं ठीक होता, इसलिए रिजर्व बैंक की कोशिशें कुछ टोटके जैसे ही थीं। अगर महंगाई की दर ऐसी ही बनी रही, तो रिजर्व बैंक के लिए भी हालात ठीक होंगे, क्योंकि वह ब्याज दरें हमेशा नहीं बढ़ाते रह सकता। सरकार को भी जनता के गुस्से का सामना कम करना पड़ेगा और वह कुछ राहत के साथ आर्थिक मोर्चे पर सोच सकेगी। खाद्य पदार्थो में महंगाई में कमी मुख्यत: सब्जियों के दामों में कमी से आई है। प्याज और आलू पिछले वर्ष के मुकाबले कम महंगे हुए हैं, लेकिन दूध, अंडे और मांस की कीमतें 10 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ी हैं। फल भी काफी महंगे हुए हैं, दालों की कीमतें भी लगभग 13 प्रतिशत बढ़ी हैं, यानी प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थो में महंगाई का दौर जारी है। महंगाई बढ़ने का बड़ा कारण खाद्य पदार्थो की भारी कमी नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की बदलती आदतें हैं। उदारीकरण के बाद देश में काफी बड़ा तबका मध्य वर्ग में शामिल हुआ है या उसकी आर्थिक स्थिति काफी हद तक सुधरी है। आर्थिक स्थिति सुधरती है, तो भोजन में अनाज की मात्र कम होकर सब्जियों की मात्र बढ़ती है और साथ ही दाल, दूध, अंडे, मांस वगैरा की मात्र बढ़ती है। भारतीयों की खाने-पीने की आदतें भी काफी विशिष्ट हैं। भारत की बड़ी आबादी शाकाहारी है, जिसकी भोजन की प्राथमिकताएं अलग हैं। दालों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने वाला भारत दुनिया का लगभग एकमात्र देश है। दूध को जितना महत्व भारत में मिलता है, उतना दुनिया में कहीं नहीं मिलता। इसलिए दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देश होने के बावजूद यहां दूध की कमी बनी रहती है।

पिछले कुछ बरसों में अनाज के अलावा अन्य चीजों की मांग बढ़ी है और उत्पादन उस हद तक नहीं बढ़ पाया। किसानों को गेहूं-चावल से इतर फसल बोने के लिए प्रोत्साहित करना इसलिए भी कठिन है, क्योंकि गेहूं-चावल का समर्थन मूल्य सरकार तय करती है, बाकी चीजों के दामों में भारी अनिश्चितता है। इसके बावजूद उत्पादन बढ़ा है और उसका असर भी दिखाई देने लगा है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि नई फसल के आने के बाद तक महंगाई में गिरावट का रुख बरकरार रहेगा। महंगाई आम जनता को सबसे ज्यादा सताने वाली समस्या है, इसलिए सरकार को भी इसके प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील होना पड़ता है। महंगाई के चलते सरकार के हाथ आर्थिक क्षेत्र में भी बंध जाते हैं, महंगाई अगर सुरक्षित सीमा में रहे, तो सरकार तेजी से विकास बढ़ाने के लिए कोशिशें कर सकती है। बहरहाल, अभी यह देखना होगा कि महंगाई का रुख क्या होता है, सभी चाहेंगे कि इसकी पकड़ और ढीली हो।

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