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जनता से संवाद सबसे जरूरी

प्रजातंत्र में मिली आजादी का दुरुपयोग लोग राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ हड़ताल, नारेबाजी और काम रोको जैसे हथकंडों के लिए करते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि सरकार कड़े फैसले नहीं ले पाती। प्रजातंत्र वहीं पर ठीक है, जहां लोग इसमें मिली आजादी का मूल्य समझते हों। गैरजिम्मेदार लोगों के हाथों में प्रजातंत्र एक ऐसे हथियार की तरह हैं, जिसका इस्तेमाल वे सरकार के खिलाफ करते हैं। यह सीमित प्रजातंत्र का ही नतीजा है कि पिछले 60 वर्षो के दौरान चीन पूरे विश्व की फैक्टरी बन गया और उसके उत्पाद दुनिया की जरूरतों पर छा गए, जबकि अति प्रजातंत्र के कारण भारत पिछड़ गया और अब रिटेल सेक्टर में एफडीआई के झगड़े में उलझा हुआ है। यदि प्रजातंत्र थोड़ा सीमित किया जाए, तो भारत भी चीन की तरह विश्व बाजार की बड़ी शक्ति बन सकता है।

यह बात सही है कि भारत एक बहुजातीय और बहुधार्मिक देश है, इसलिए यहां प्रजातंत्र के मायने और अधिक महत्वपूर्ण हैं। लेकिन सवाल वही है कि लोग कितने जिम्मेदार हैं? हमारा मलयेशिया भी एक बहुधार्मिक देश है। वहां चीनी, भारतीय और स्थानीय मलय लोग रहते हैं। जहां एक ही जाति या धर्म के लोग हैं, वहां भी समस्याएं हैं। ऐसी व्यवस्थाओं में अमीर और गरीब का संघर्ष बना रहता है। मैं मानता हूं कि आने वाले समय में सभी देश बहुधार्मिक देश बन जाएंगे, क्योंकि लोग एक जगह से दूसरी जगह बसने के लिए जाते रहते हैं।

जहां तक आतंकवाद का सवाल है, तो मेरा मानना है कि आतंकवाद कमर में बम बांधकर खुद को उड़ा लेना ही नहीं है। दहशतगर्दी उसे भी कहते हैं, जो आसमान से आती है (नाटो बलों की ओर इशारा, जिसने एक हफ्ते पहले पाकिस्तान के पश्चिमी इलाके में विमानों से बमबारी कर 24 पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया)। नाटो के ऐसे हमले हमें डराते हैं और जो भी हमें डराता है, वह आतंकवाद है। पर अफसोस है कि नाटो  जैसे बल आतंकवाद खत्म करने की बजाय और ज्यादा आतंकवादी पैदा कर रहे हैं। उनकी कार्रवाई से गुस्सा बढ़ रहा है। यह रुकना चाहिए। यह भी देखा जा रहा है कि अमेरिका अब दक्षिण एशिया को अपना युद्ध-क्षेत्र बना रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि चीन का मुकाबला करने के लिए यह जरूरी है। लेकिन चीन  पिछले चार हजार वर्षो से मौजूद है और दो हजार साल से मलयेशिया उसके साथ व्यापार कर रहा है। चीन एक ताकत है। आप इसे यूं खारिज नहीं कर सकते। चाहे आप उसे पसंद करें या न करें। चीन के प्रति समर्थक रुख के कारण पश्चिमी मुल्कों ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया तथा अमेरिका के साथ मलयेशिया के रिश्ते तल्ख हैं। लेकिन यह मलयेशिया का अपना रुख है, जिसे बदलने की आवश्यकता नहीं है। दरअसल, चीन के साथ मलयेशिया काफी समय से रह रहा है, लेकिन चीन ने कभी मलयेशिया पर कब्जा करने की कोशिश नहीं की। जबकि इस देश का 40 फीसदी व्यापार चीनी लोगों के हाथों में है। महज दो फीसदी व्यापार मलय लोग करते हैं। मेरा मानना है कि सीमा विवाद का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है। क्या अमेरिका की सीमा इराक से लगती है, लेकिन उसने फिर भी हजारों किलोमीटर दूर इराक पर कब्जा कर लिया। इसलिए चीन से भारत को डरने की जरूरत नहीं है। जहां तक दलाई लामा का प्रश्न है, तो चीन का इस मामले में एक   रुख है, जिसे भारत पसंद नहीं कर सकता। लेकिन चीन में और भी बहुत कुछ सकारात्मक हो रहा है, भारत को उसकी नकल करनी चाहिए।

मुझे कट्टर इस्लामी समझा जाता है, जबकि मैंने अपने यहां कट्टरवाद का काफी विरोध किया है। यदि चीजों को सही तरीके से रखा जाए, तो मैं इसे कट्टरवाद की जगह अतिवाद बोलना चाहूंगा। धर्म का अनुपालन करना कट्टरवाद हो सकता है, लेकिन इसे गलत अर्थ में ले जाना अतिवाद है। हम अतिवाद से ही जूझ रहे हैं। इस्लाम का अर्थ है शांति, लेकिन अतिवादी लोग इसकी व्याख्या अपने तरीके से कर उसे कट्टर बना देते हैं। इसके लिए उन्हें समझाना चाहिए और बताना चाहिए कि इस्लाम का सही अर्थ क्या है। हिंसा से कोई बात नहीं बनती, हिंसा करने या उन्हें जेल में डालने से नाराजगी बढ़ती है, जिससे कट्टरवाद और फैलता है। पाकिस्तान का उदाहरण ले लीजिए। वहां अतिवाद के साथ हिंसा भी बहुत है, जबकि मलयेशिया में हिंसा नहीं है। बात समझाने से ही बनेगी। यदि आप लोगों को जेल में डालेंगे, तो उनमें गुस्सा बढ़ेगा, जिससे शांति के प्रयास बेकार हो जाएंगे।

मेरा शुरू से ही मानना रहा है कि दो देशों के बीच के विवाद उनमें बातचीत से ही सुलझने चाहिए। कश्मीर का विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच है, इसमें तीसरे देश का कोई रोल नहीं है। लेकिन यदि ऐसा न हो, तो मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में जाना चाहिए, न कि संयुक्त राज्य अमेरिका में। अमेरिका को देशों के विवाद निपटाने का कोई हक नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि अमेरिका देशों के अंदरूनी मामलों में दखल दे रहा है। यह ठीक है कि मैं नियंत्रित प्रजातंत्र में यकीन रखता हूं, लेकिन मैंने अपने 22 वर्षो के (1981 से 2003) शासनकाल में मीडिया पर कभी पाबंदियां नहीं लगाईं। यह कहना भी गलत है कि न्यायपालिका और राजशाही को मैंने एक दायरे में सीमित कर दिया था। मीडिया मेरे खिलाफ खराब से खराब लिखता रहा, लेकिन उसे कभी कुछ नहीं कहा गया। फिर भी मेरा मानना है कि मीडिया को जिम्मेदार होना चाहिए, क्योंकि किसी के बारे में खराब लिखने से आप कुछ हासिल नहीं कर पाते। 

भारत की समस्या यह है कि यहां राज्यों को ज्यादा शक्तियां मिली हुई हैं, जबकि अधिक शक्तियां केंद्र के पास होनी चाहिए। भारत में यदि केंद्रीय नेतृत्व मजबूत हो, तो उसके लिए अच्छा रहेगा। केंद्रीय नेतृत्व की मजबूती से विदेशों के साथ संबंध अच्छे बनते हैं और देश तरक्की करता है। बहुदलीय व्यवस्था भी भारत के लिए एक समस्या है, क्योंकि इनमें कभी भी, किसी मुद्दे पर एक राय नहीं बन सकती। किसी न किसी दल के पास विरोध का कोई न कोई कारण रह ही जाता है।

भारत में रिटेल सेक्टर में एफडीआई पर जारी घमासान का कारण संवाद की कमी है। सरकार को जनता के बीच जाना चाहिए और उसेबताना चाहिए कि उनके लिए क्या सही है। यह सही है कि इस देश की आबादी एक अरब से अधिक है और यह काम थोड़ा मुश्किल है, लेकिन सरकार को यह करना ही पड़ेगा।
प्रस्तुति : ब्यूरो (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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