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सोशल नेटवर्किग पर पहरा, गलत प्राथमिकता

सरकार ट्विटर, फेसबुक और ऑर्कुट में पोस्ट होने वाले कंटेंट को फिल्टर करने की बात कर रही है। उसकी यह कोशिश अव्यावहारिक तो है ही, दुनिया भर के अनुभव यही बताते हैं कि ऐसी कोशिश करने वाली सरकारें बहुत तेजी से अलोकप्रिय भी हो जाती हैं। इससे ज्यादा जरूरी यह था कि सरकार टेलीग्राफी ऐक्ट का सख्ती से पालन करवाती और अपने सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र को अधिक सुरक्षित बनाती।

संसद सदस्य अमर सिंह के मामले में यह बात सामने आई थी कि निजी टेलीफोन कंपनियों पर टैपिंग को लेकर कोई नियंत्रण नहीं है। वहां कोई भी किसी का फोन टैप करवा सकता है। यहां तक कि ये कंपनियां अपने उपभोक्ताओं के नंबर मार्केटिंग कंपनियों को बेच डालती हैं, जो उपभोक्ताओं को अंधाधुंध संदेश भेजकर और कॉल करके परेशान करती हैं। अमर सिंह के केस में दिल्ली पुलिस उपायुक्त के फर्जी लेटर पैड पर दी गई अनुमति के आधार पर उनके फोन टैपिंग पर लगवा दिए गए। सुप्रीम कोर्ट में इस लेटर को फर्जी पाया गया था। टेलीग्राफी ऐक्ट के तहत फोन तभी टैप पर लगाया जा सकता है, जब उसके लिए पुलिस के एक तय रैंक के उच्च अधिकारी या गृह सचिव की अनुमति ले ली गई हो। लेकिन इस प्रावधान का मजाक खूब उड़ाया जाता है। टैपिंग को लेकर हाल में विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे ने जो खुलासा किया है, वह तो और चौंकाने वाला है। उन्होंने कहा कि भारत का पूरा सूचना तंत्र पश्चिमी देशों की मॉनिटरिंग सीमा में है। चाहे क्रेडिट कार्डो के प्रयोग की जानकारी हो या फिर बैंकों से लेन-देन की, ये तमाम सूचनाएं अमेरिकी बैंकों के पास रियल टाइम में पहुंच रही हैं। पिछले दिनों सेना के कुछ कंप्यूटरों के हैक होने की बात भी सामने आई थी। असांजे ने तो यहां तक बताया है कि कुछ भारतीय कंपनियां भी टैपिंग और मॉनिटरिंग के काम में लगी हुई हैं, जिनका प्रयोग रॉ करता है। वहीं चीन ने सीबीआई का पूरा ईमेल नेटवर्क ही अपने कंप्यूटरों पर डायवर्ट कर रखा है। असांजे का दावा है कि इन बातों के उनके पास पर्याप्त सुबूत हैं।

ऐसे में केंद्र सरकार की पहली जिम्मेदारी यह होनी चाहिए कि वह इस तरह की डाटा लीकेज को रोके। यह देश की सुरक्षा के लिए भी जरूरी है और इसलिए भी कि लोगों की निजता की रक्षा करना सरकार का दायित्व है। लेकिन सरकार ने अपनी प्राथमिकता बनाई फेसबुक और ट्विटर पर लिखे गए कंटेंट को नियंत्रित करने की, जो अनौपचारिक व त्वरित प्रतिक्रिया से ज्यादा कुछ नहीं है। इनका न तो कोई तथ्यात्मक मूल्य होता है, और न ही साक्ष्यात्मक। यह ऐसा क्षेत्र है, जहां सरकार को अपनी शक्ति खर्च करने की जरूरत ही नहीं है। अगर मामला ज्यादा बढ़े, तो उसके लिए देश में आईटी ऐक्ट है, जिसका इस्तेमाल किया जा सकता है। पर न जाने क्यों सरकार ने कानून के इस्तेमाल की बजाय बदनामी मोल लेने वाला रास्ता चुना।

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