DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

असहमति के संकेत

धांधली से भरे चुनाव भी संकेत देते हैं। रूसी मतदाताओं ने इसकी तस्दीक की है। रूस के संसदीय चुनाव में सार्थक विकल्प की कमी थी। ऊपर से अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने भी चुनाव में धांधली के संकेत दिए थे। तब भी, मतदाताओं ने व्लादिमीर पुतिन की सरकार से अपनी असहमति साफ जता दी। उनकी यूनाइटेड रूस पार्टी को 49.5 फीसदी वोट मिले, जबकि चार साल पहले के चुनाव में उसे 64 फीसदी वोट मिले थे। सत्ता विरोधी लहर का एक बड़ा हिस्सा वाम पार्टी के खाते में गया। फिलहाल पुतिन की सरकार पर कोई खतरा नहीं है। पार्टी को अब भी पार्लियामेंट में बहुमत प्राप्त है, परंतु दुनिया भर में बह रही बयार का असर रूसी जनता पर भी पड़ा है। वर्ष 2011 में दुनिया भर में तानाशाहों के खिलाफ जनता के गुस्से को परवान चढ़ते देखा गया है। मिस्र के हुस्नी मुबारक की तरह पुतिन ने भी सुधारवादी कार्यक्रमों की जगह कटौती को ही बढ़ावा दिया। अपने सहयोगी दमित्री मेदवेदेव को किनारे करके उन्होंने फिर से राष्ट्रपति बनने का फैसला किया। इससे जनता की उम्मीदों को धक्का लगा है। दरअसल, रूसी जनता खुली राजनीतिक व्यवस्था की उम्मीद लगाए बैठी थी।

वैसे भी पुतिन की यह सियासी चाल किसी अपराध से कम नहीं है। यह कहने की जरूरत नहीं कि सत्तारूढ़ पार्टी की किस हद तक किरकिरी हुई है। सेंट पिट्सबर्ग मध्य में पुतिन की पार्टी को महज 27 फीसदी वोट मिले, जबकि यह उनका राजनीतिक गृह-क्षेत्र है। ऐसे नतीजों को बड़े पैमाने पर हेराफेरी के जरिये बराबर किया गया है। चेचेन्या में 99 फीसदी वोटरों ने चुनाव में हिस्सा लिया, लेकिन यूनाइटेड रूस पार्टी को 99.5 फीसदी वोट मिले। चेचेन्या पुतिन की दमनकारी नीतियों से परेशान है। आर्थिक विश्लेषकों को लगता है कि राष्ट्रपति चुनाव से पहले सरकारी खजाने को खाली किया जा रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ ठोस कदम उठाने से जनता खुश हो सकती है, लेकिन पुतिन का इतिहास इस बात की पुष्टि करता है कि वह और खतरनाक रास्ता अख्तियार कर सकते हैं। वह राष्ट्रवादी नारे लगाकर जनता को फिर से गुमराह करने की कोशिश में हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:असहमति के संकेत