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अस्पतालों में बदइंतजामी

इन दिनों सरकारी अस्पतालों में काफी अव्यवस्था देखने को मिल रही है। मरीजों से मिलने अस्पतालों में काफी रिश्तेदार आते हैं। इससे वहां भीड़ लग जाती है, जिससे दूसरे मरीजों को काफी परेशानी उठानी पड़ती है। इसलिए अस्पताल प्रबंधन को ठोस कदम उठाने की दरकार है। इस बात की सख्त व्यवस्था की जाए कि एक बार में एक मरीज से मिलने दो से ज्यादा लोग न आएं। एक बात और। अक्सर देखा गया है कि मरीज अपने नंबर का इंतजार नहीं करते। वे या उनके रिश्तेदार लाइन तोड़कर जल्द से जल्द डॉक्टर के पास जाना चाहते हैं। यह ठीक नहीं है। बुजुर्ग मरीजों को पहले मौका देना चाहिए। अगर आपकी सेहत ज्यादा खराब है, तो इमरजेंसी में जाएं। कतार के नियमों का पालन करें। इस तरह के दिशा-निर्देश अस्पताल में जगह-जगह पर लिखे हों, तो सबके लिए अच्छा होगा। इस दिशा में अस्पताल प्रशासन को कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए। डॉक्टर भी कई बार मरीजों को डांटने लगते हैं। ऐसे डॉक्टरों से गुजारिश है कि वे दर्द के मारे लोगों के साथ हमदर्दी भरा बरताव करें।
इंदिरा सदावर्ती 35, दयानंद विहार, दिल्ली

जिंदादिल अभिनेता
जीवन के सफर में राही, मिलते हैं बिछड़ जाने को, और दे जाते हैं यादें, तन्हाई में तड़पाने को। यह देव साहब की फिल्म ‘मुनीम जी’ का गाना है। 1955 में यह फिल्म मैंने देखी थी। हम दो दोस्तों ने ‘मुनीम जी’ फिल्म देखने का निश्चय किया। किंतु न तो पैसे थे, न माता-पिता से अनुमति मिलती। अत: हमने एक-दूसरे के घर पढ़ने जाने का बहाना अपने-अपने माता-पिता के सामने किया। बाजार में जाकर पुरानी कॉपियां और किताबें बेचीं और पांच-पांच आने लेकर साइकिल से यूसुफ सराय के मोहिनी थिएटर चल दिए। दिसंबर का महीना था और कड़ाके की सर्दी थी। अधचीनी तक पहुंचते-पहुंचते बारिश होने लगी। लेकिन हम लोग रुके नहीं, थिएटर पहुंचे। ठिठुरते हुए ही हमने वह फिल्म देखी। आज देव साहब जीवन के सफर में हमसे बिछड़ गए हैं, तो यह जानकर मन को गहरा आघात लगा है और अनायास ही आंखों में आंसू भर आए हैं। उनकी ही फिल्म का एक गाना बार-बार याद आ रहा है, ‘अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं..।’
जयदयाल सचदेव, विदेश संचार निगम अपार्टमेंट, सेक्टर-62, नोएडा

हंगामा है क्यों बरपा
संसद का काफी वक्त हंगामे की भेंट चढ़ गया है। विपक्षी पार्टियां संसद की कार्यवाही में बाधा डालकर जनता के विश्वास से खिलवाड़ करती हैं। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक है, पर इससे संसदीय कार्यवाही पर असर पड़े, यह ठीक नहीं है। मतभेदों पर सदन में चर्चा होनी चाहिए, ताकि ऐसे मुद्दों का हल निकाला जा सके। शोर-शराबा कर संसद की कार्यवाही को बाधित करना उस जनता के साथ अन्याय है, जिसने उन्हें चुनकर वहां भेजा है। हो-हल्ला से संसद और देश की प्रतिष्ठा खराब होती है।
युधिष्ठिर लाल कक्कड़, लक्ष्मी गार्डेन, गुड़गांव, हरियाणा

महंगाई की मार
आज हमारे देश में महंगाई विकराल रूप ले चुकी है। इससे संपन्न और गरीब, दोनों ही तबके परेशान हैं। प्याज और टमाटर जैसी चीजों के दाम ने पसीने छुड़ा दिए हैं, लेकिन सरकार की नजर इस ओर नहीं है। वैसे तो सरकार कह रही है कि अगले कुछ महीनों में महंगाई कम हो जाएगी, पर कब होगी, यह किसे पता है। क्या इससे पहले कभी कम हुई है? अगर सरकार इस महंगाई पर काबू करना चाहती है, तो फिर वह कालाबाजारी पर रोक क्यों नहीं लगा रही है। सारा खेल बिचौलियों का है, जो देश में महंगाई बढ़ा रहे हैं। इन पर अंकुश लगना ही चाहिए।
विमल अरोड़ा, बी-156, डेरावाल नगर, दिल्ली

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