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गंगातट पर जीवंत हुई थार की संस्कृति व्यास महोत्सव गूंजे ठुमरी और

वाराणसी। वरिष्ठ संवाददातागंगा का अस्सी तट। व्यास महोत्सव के तहत आयोजन की दूसरी निशा। गंगातट बुधवार की शाम राजस्थानी लोक संस्कृति की आभा और सौंदर्य से घिरा रहा। उपशास्त्रीय गायन के बोल गूंजे तो कथक के जरिये कलाकारों ने पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इसके पूर्व सुबह तट पर श्री पट्टाभिराम शास्त्री वेद मीमांसा अनुसंधान केन्द्र के संयोजन में विद्वानों ने वेद पाठ किया।सांस्कृतिक संध्या का आगाज गायिका ममता शर्मा के स्वर वंदन से हुआ। ठुमरी के बोल ‘मोहे नजरिया लागी’ सुनाया तो गुलाबी ठंड में मौजूद श्रोताओं की सुनने की इच्छा जागने लगी। इसके बाद दादरा में ‘तोहे लेके संवरिया निकल चलबे’ सुनाया। ममता ने ‘संवरिया प्यारे रे मेरे गुईयां’ तथा ‘लागी बयरिया मैं सो गयी हो ननदी’ सुनाकर वाहवाही लूटी। इसके बाद राग पीलू में बारामासा ‘हमका ले ना गए रे बे-मनऊ’ और अंत में राग भरवी में कबीर के दोहे को स्वर दिया। वायलिन पर सुखदेव, तबले पर नंदकिशोर, हारमोनियम पर विजय शर्मा और घुंघरू व ढफली पर संजय श्रीवास्तव ने साथ दिया। इसके बाद बाल कलाकार सुकृति शुक्ला ने शिव तांडव नृत्य किया। बीएचयू की संगीत एवं मंच कला संकाय की एमम्यूज की छात्रा दिव्या श्रीवास्तव ने भरतनाट्यम में शिव स्तुति की प्रस्तुति की। इसके बाद लखनऊ की राष्ट्रीय कथक संस्थान के कलाकारों ने मंच संभाला। असीम बंधु भट्टाचार्या के निर्देशन और देवाशीष घोष के नृत्य निर्देशन में पृथ्वी की उत्पत्ति, विनाश, भौतिक लिप्सा से जुड़ी कहानी मंच पर क्रमबद्ध उभरने लगी। धरती पर एकाधीकार के लिए युद्ध चला तो शांति के प्रयास भी दिखे। लेकिन सबसे अधिक नुकसान प्राकृतिक सम्पदा को पहुंचा। इनके बाद मंच राजस्थानी संस्कृति से घिर गया। जयपुर के मेवा सपेरा की टीम एक के बाद एक प्रस्तुतियों से राजस्थान को काशी में उतार दिया। शुरुआत गणेश वंदना से हुई। परम्परागत चरी नृत्य के माध्यम से कलाकारों ने स्वागत किया। इसके बाद हास्य रस से ओतप्रोत बंजारा-बंजारी नृत्य की प्रस्तुति हुयी। भवई नृत्य में संतुलन और प्रतिभा का बेहतरीन तालमेल दिखा। नृत्यांगना ने माथे पर 7 मटके लिये दो स्टील के ग्लास पर फिर तलवार की धार पर नृत्यकर लोगों की वाहवाही लूटी। इसी क्रम में निमोड़ा-निमोड़ा निमोड़ा, कांचा-कांचा . गीत पर मंच पर कलाकार और सामने दर्शक झूम उठे। पुरुष कलाकारों ने भी माथे पर चार खाली गिलास और उस पर पानी भरा मटका रखकर संतुलत के साथ लोच का प्रदर्शन किया। कलाकारों ने मंच पर आग के खेल से रोमांचित किया तो कालबेलिया नृत्य ने बदन के लचक, लोच की बानगी पेश की। मुख्य गायक मेवा सेपरा, सहगायक सवईं नाथ, नगाड़े पर राजू राणा, ढोलक पर रमजान खान, बीन पर कैलाशनाथ ने साथ दिया। संचालन देश दीपक मिश्र ने किया।

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