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एनिमल हाउस के चूहे खा गए लाखों !

निज संवाददाता जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वाचल विश्वविद्यालय के फार्मेसी विभाग के एनिमल हाउस में केवल दो चूहे पिछले तीन साल में लाखों रुपये का चना व ब्रेड खा गए। लेकिन इन चूहों को देखने के बाद यह नहीं लगता कि उन्होंने विवि का इतने रुपयों का चना और ब्रेड खाया है। चूहों के मद में आने वाला पैसा उन पर खर्च किया गया या फिर कहीं और, यह जांच का विषय है।

फार्मेसी के छात्रों को प्रैक्टिकल के लिए कम से कम दस नर-मादा चूहों और इतने ही खरगोश की जरूरत होती है। लेकिन इन मानकों को दरकिनार कर पूविवि प्रशासन केवल शोपीस में दो चूहों को रखकर प्रैक्टिकल कराने का दावा कर रहा है। इससे भी बड़ी बात तो यह है कि प्रैक्टिकल के लिए एनिमल हाउस में रखे गए दो खरगोश मौजूदा समय में कुलपति आवास में धमाचौकड़ी मचा रहे हैं।

वर्ष 2002 में निर्मित फार्मेसी भवन में एक साल बाद प्रवेश लेना शुरू किया गया था। 2004 से कक्षाएं चलने लगीं। चार साल बाद एक एनिमल हाउस बना। तब 70 रुपये में दो चूहे खरीदकर विभाग के एक कमरे में रख दिया गया। साथ में दो खरगोश भी रख दिए गए। इसी से प्रैक्टिकल कराए जाने का दावा किया जाता रहा। जबकि विभागीय सूत्रों की मानें तो नियमत: कम से कम 20 चूहे व दस खरगोश का होना आवश्यक है।

उसमें भी नर-मादा दोनों होना जरूरी है। लेकिन मौजूदा समय में फार्मेसी विभाग के एनिमल हाउस में दो चूहे हैं और दोनों नर हैं। दोनों खरगोश कुलपति आवास की शोभा बढ़ा रहे हैं। रेकार्डो को देखा जाए तो हर दूसरे-तीसरे माह चूहे खरीदने की बात प्रकाश में आयी है। जबकि मौके पर सिर्फ दो ही चूहे पाए गए। हर माह इन चूहों पर 12 सौ से 22 सौ रुपये तक का खर्च दिखाया गया है। चूहों की रखवाली के लिए 78 रुपये के हिसाब से प्रतिदिन पारिश्रमिक दिया जाता है। यह भी पैसा मानो बट्टे खाते में ही जाता है। क्योंकि जहां चूहे रहते हैं वह स्थान बेहद गंदा है। कभी सफाई नहीं होती है। ‘‘स्थिति बहुत खराब है। लेकिन 80 छात्रों के प्रैक्टिकल के लिए हमें जब एनीमल की जरूरत पड़ती है तो हम बाहर से किराए पर मंगा लेते हैं।

बहुत से चूहे खरीदे गए, लेकिन वह मर गए।’’ डा. पूजा सक्सेना, एनीमल हाऊस प्रभारी पूविवि ‘‘पिछले तीन माह में इन दो चूहों ने महज 680 रुपये का चना व ब्रेड खाया है, जबकि इसके पहले हर माह इससे अधिक का चना व ब्रेड खा जाते थे। मौजूदा समय में दो खरगोश कुलपति आवास पर हैं। क्योंकि यहां उनकी रखवाली ठीक से नहीं हो पाती थी। ’’ ज्ञानेश पराश्रय, कार्यालय अधीक्षक पूविवि

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