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जला खेमा, लुटा काफिला चला कारवां दरगाहे फातमान

वाराणसी निज संवाददाता। 11 वीं मोहर्रम को इमाम हुसैन के बचे हुए कुनबे का जख्मी खेमा और लुटे हुए काफिले की याद में कारवां बुधवार को दालमंडी स्थित डॉ. नाजिम जाफरी के आवास से निकाला। काफिले में शामिल लोग हाथी पर सवार चुपके का डंका बजाते, अंजुमन हैदरी के नौहाख्वा सवारी पढ़ते हुए दरगाहे फातमान तक पहुंचे।

साथ में अलम और दुलदुल का जुलूस भी था। मोहर्रम का यह इकलौता जुलूस होता है जिसमे अंजुमनें नौहाख्वानी और मातम करते नहीं चलती हैं। कदीमी लुटे काफिले के जुलूस की शुरुआत डॉ. जाफरी के पेशख्वानी से हुई। मौ. सैय्यद जिशान हैदर ने मजलिस को खेताब करते हुए शहीदानें कर्बला के वाक्यात का मंजर पेश किया। महिलाओं ने दुलदुल की जियारत करते हुए ‘ऐ मोमिनो उठाओ जनाजा हुसैन का..’ पर मातम किया। रोती बिलखती महिलाएं और बच्चों दुलदुल से लिपट कर बस यही सवाल पूछती रहे, कहा है, मेरे हुसैन। गमगीन माहौल को संभालते हुए सरफराज हुसैन और सुजात हुसैन ने ‘हुसन कौन रसूले खुदा के दिल का चैन, अली का लखते जिगर फातमा का नुरूलएरुन, उसी हुसैन की ऐ मोमिनो सवारी है..’ मातम करते हुए दुलदुल का जुलूस निकाला।

काफिला में शामिल लोग रास्ते भर अकीदतमंद खामोशी व आंखों में आंसू लिए दरगाहे फातमान की तरफ बढ़ते रहे। फातमान पहुंचने से पूर्व ‘नूरे निगाहे सरवरे आलम मेरा सलाम, दीने खुदा के हुज्जते मोहकम मेरा सलाम’ पढ़ते हुए दरगाह में दाखिल हुए। मौला अली, इमाम हुसैन, हजरत अब्बास, हजरत फातमा के रौजे पर दुलदुल की जियारत कराने के बाद मजलिसे दल्लान में सभी लोग जुटे।

यहां शायर अतहर बनारसी, रेहान बनारसी, प्रो. ऐनुल हसन और डॉ. नाजिम ने पेशख्वानी की। मजलिसे दल्लान और दरगाह को खेताब करते हुए मौ. जिशान ने 11वीं मोहर्रम को यजीदी सेना के जुल्मो-ओ-सितम का जारोकतार बयान करते रहे। कर्बला का जिक्र सुन सभी फूट-फूंट कर बिलखते रहे।

इमाम जैनुल की याद में जंजीरों से बंधा दिखा मुहब्बत जंग-ए-कर्बला में इमाम हुसैन की शहादत के बाद यजीदी फौज ने बचे हुए कुनबे की महिलाओं और बच्चों को कैद बनाकर दरबार-ए-यजीद में पेश किया था।

इनमे इमाम हुसैन के बेटे जनाब जैनुल आब्दीन को बीमारी के बावजूद गले में कांटेदार तौख, हाथों में हथकड़ी, पैर में बेड़ी, कमर में जंजीर से बांधकर लाया गया था। क्षेत्रीय युवक अली ने इसी मंजर को चुपके का डंका जुलूस में पेश किया। वह भी सफेद कपड़े में लोहे की बेडिम्यों से जकड़ा हुए दरगाहे फातमान तक गया।

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