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कई विधेयक की राह अटका गया एफडीआई

मल्टी ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश का फैसला टालने के बाद केंद्र सरकार सदमे में है और इससे उबरने की कोशिशों में लगी है। सरकार को समझ नहीं आ रहा कि लगातार बढ़ रही मुद्रास्फीति के साथ खराब हो रही अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए अब वह कौन सा तीर अपने तरकश से निकाले।

यूपीए के एक वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री ने स्वीकार किया, जब तक तृणमूल कांग्रेस का समर्थन सरकार के लिए जरूरी है, आर्थिक सुधारों को ठंडे बस्ते में डालने के अलावा और कोई चारा नहीं है। उनका मानना था कि ऐसे हर कदम का, जिसे वामपंथी या विपक्षी दल आम आदमी विरोधी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित वाला करार देंगे, उसका विरोध करना ममता के लिए लाजिमी है और, बिना ममता के समर्थन के सरकार के लिए फैसला करना उससे भी कठिन होगा।
कांग्रेस की दिक्कत यह है कि अपने ही एक घटक के विरोध को वह नजरअंदाज नहीं कर सकती। जो काम वाम मोर्चा अपने 60 सदस्यों के साथ यूपीए-1 में कर रहा था, वह ममता 19 सदस्यों के साथ यूपीए-2 में कर रही हैं।

यूपीए सूत्रों का कहना था कि सरकार मनरेगा पर हर साल 40 हजार करोड़ रुपये दे रही है। खाद तथा अनाज पर उसका सब्सिडी का बिल एक लाख 20 हजार करोड़ रुपये है। इसी सत्र में सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक लाना चाहती है, जिस पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च आने का अनुमान है। खर्च के नए क्षेत्र खुल रहे हैं लेकिन आमदनी के नए स्नोत नहीं बन रहे।

सरकार के रणनीतिकारों का मानना था रिटेल एफडीआई से उसे अच्छा-खासा पैसा मिल सकता था, जिसे वह सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं में खर्च कर सकती थी। ममता की राजनीति से दुखी केंद्रीय मंत्री ने स्वीकार किया कि उन्हें निकट भविष्य में एफडीआई के फैसले पर सरकार द्वारा फिर से हिम्मत दिखाने की कोई संभावना नजर नहीं आती।

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