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जीतेगा तो जनता का दबाव ही

अन्ना हजारे का नाम विश्व के सौ विचारशील लोगों की सूची में आ गया है। ये वे विचारवान लोग हैं, जो खुद को किसी रूप में जनहित से जोड़ते हैं। इनमें वे राजनीतिज्ञ नहीं हैं, जो जनहित की बात करते हैं, पर अपने और अपनी पार्टी के स्वार्थो से उबर नहीं पाते। जन-राजनीति का मतलब है, जो राजनीति जन-जन का हित करे और वह भी बिना यह सोचे कि किस काम से हमारा और हमारी पार्टी का हित होगा।

महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज में संकेत दिया है कि संसद में पार्टियां जनहित उसी को समझती हैं, जो उनकी पार्टी या उन लोगों के हित में हो, जो उनके अपने समर्थक हों। गांधी ने क्या सोचा या क्या कहा, इससे कुछ पार्टियों के नेता इसलिए अनभिज्ञ हैं, क्योंकि वे गांधी को अपने पूर्वाग्रहों के कारण पसंद नहीं करते या उनका दृष्टिकोण एकांगी बन गया है। वे विदेशी विचारों से मुत्तासिर होने के कारण अपने देश की समस्याओं के बारे में उतना ही जानते हैं, जितना उन्हें उनकी केंद्रीय समिति द्वारा बताया जाता है।

अन्ना का नाम उस सूची में क्यों आया? वह कोई ऐसे ज्ञानी नहीं हैं कि सारे संसार का ज्ञान अपने अंदर समेटे बैठे हों। उस दृष्टि से तो हमारे आधुनिक विद्वान उन्हें अल्पज्ञ ही कहेंगे। लेकिन वह ज्ञानी इसलिए हैं, क्योंकि उनकी संवेदना जन के उस मुख्य कमजोर बिंदु को छू सकी, जो इस देश को दिन पर दिन कमजोर बनाता जा रहा है। तथाकथित आधुनिक ज्ञानी ऐसी बातें मुश्किल से देख पाते हैं। भ्रष्टाचार देश में हर स्तर पर फैला ही नहीं, बल्कि दिन-दूना रात-चौगुना बढ़ता जा रहा है। जिसने जीना दूभर कर दिया है।

महंगाई की जब बात की जाती है, तो हम भ्रष्टाचार को उसके साथ जोड़कर नहीं देखते। क्या इसलिए कि दोनों को मिलाने से सरकार के लिए एक ऐसी विशाल समस्या खड़ी हो जाएगी, जो धन्नासेठों तक के सामने भी अबूझ सवालों के ढेर लगा देगी? भ्रष्टाचार जल की तरह है, जो महंगाई के गूदड़ को दिन पर दिन भारी करता जा रहा है और भूख को हौवा बनाने में लगा है। रोटी का एक लुकमा इतना वजनी हो जाएगा कि एक आदमी के लिए मुंह तक ले जाना दुश्वार हो जाए। सरकार तो टैक्स लगाकर अपनी मुश्किलें आसान कर लेती है। साथ-साथ उसकी छांव में पलने वाले हुक्मरान सुविधा-राशि प्राप्त करके अपनी कठिनाइयां आसान कर लेते हैं।

लेकिन ये नामुराद टैक्स, सुविधा शुल्क अंतत: उस लुकमे का ही वजन बढ़ाते हैं, जो आम आदमी किसी तरह हासिल करता है। टैक्स देना हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझता है, पर वह भ्रष्टाचार का पेट कैसे भरे? गांव का चौकीदार, पटवारी, सिपाही, स्कूल के मास्टर का नजराना, बच्चे के लिए टय़ूशन (सम्मानजनक शब्द कोचिंग), पट्टी बंधवाने के लिए सरकारी अस्पताल में सुविधा राशि जैसे अनेक अपरिभाषित खर्च हर इंसान से वसूले जाते हैं।

अन्ना ने अगर भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया, तो ऐसा क्या गुनाह किया कि सरकार से लेकर कुछ सियासी पार्टियां उनके खिलाफ खड़ी हो गईं? अन्ना चाहते हैं कि लुक्मे पर बढ़ता वजन कुछ कम हो, फिर इतना शोर क्यों बरपा है? आज जहान भर में शोर है कि भारत बेईमानों की सूची में 87 से 95वें नंबर पर आ गया है। 95, 87 से बड़ा है, क्या हम इसी बात से संतोष करें? कई बार इस तरह का बड़प्पन शर्मसार कर देता है। यह विशेषज्ञ समिति इस आधार पर तय करती है कि हुक्मरानों के भ्रष्टाचार ने इस क्षेत्र में कितनी उन्नति की है, यानी पहले से कितने ज्यादा भ्रष्ट हुए हैं।

अगर सरकार इस बात से संतोष महसूस करती है कि हम सोमालिया, अफगानिस्तान, उत्तर कोरिया आदि से बेहतर हैं, तो बात अलग है। मैं पूरी टीम की बात नहीं करता, पर अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ईमानदार कोशिश की है। मैं आडवाणी की बात भी नहीं करता, जो वोट के लिए रथ घुमाते रहे, पर उप-प्रधानमंत्री रहते हुए उन्हें भ्रष्टाचार का ध्यान नहीं आया। उसी वोट वाले रथ पर भ्रष्टाचार का विरोध करने के लिए रौनक अफरोज होकर फिर निकल पड़े। न मैं बाबा रामदेव की बात करता हूं, जिन्होंने 11 साल में हजारों करोड़ रुपये की मिल्कियत खड़ी कर ली। अब वह भी भ्रष्टाचार के खिलाफ ताल ठोंक रहे हैं।

क्या सरकारों को नहीं लगता कि देश ने उनकी रहनुमाई में इस क्षेत्र में उन्नति ही की है? जनता इस तकलीफ को एक अंतर पीड़ा की तरह महसूस करती है। अन्ना ने जनता के उसी दर्द पर उंगली रखी है। संसद ने सदन की भावना के तहत अन्ना की तीन शर्तो को निर्विरोध स्वीकारा था। जिसके तहत जन-लोकपाल के क्षेत्र में संपूर्ण नौकरशाही को सम्मिलित करने का आश्वासन दिया गया था। लेकिन एकाएक स्टैंडिंग कमेटी ने निर्णय से पलटी मारकर ‘सी’ वर्ग को लोकपाल के क्षेत्र से बाहर कर दिया, जिससे आम आदमी हर क्षण मर रहा है। पैसा तो उसी ‘सी’ क्लास के जरिये साइफन होकर ऊपर पहुंचता है।

सदन की भावना का सम्मान न करके हर सांसद जैसे सोच रहा हो कि अगर कल मैं प्रधानमंत्री बन गया, तो मैं इस नियम की पेशबंदी से कैसे बच पाऊंगा। यह एक रुग्ण समाज की सोच है। प्रधानमंत्री खुद लोकपाल के दायरे में रहने के लिए तैयार हैं, लेकिन लोग इस पर एकमत नहीं हैं। क्या हर सांसद प्रधानमंत्री का ख्वाब देखकर अपनी पेशबंदी कर रहा है?

एक निर्णय लेकर उसे पलट देना यह साबित करता है कि सरकार की नीयत में स्थायित्व नहीं है। इस तरह के नियम की असहमति बहुमत के सामने कोई मायने नहीं रखती। बहुमत का निर्णय अंतिम है। सवाल नियमों का इतना नहीं है, जितना सत्ताधारियों की नीयत का है। इसी बीच सरकार ने मामले को उलझाने के लिए खुदरा बाजार में एफ डीआई का मसला खड़ा करके जनता का ध्यान बांटना चाहा, पर अन्ना हजारे की ललकार और जनता की जागरूकता मुद्दे को इतनी आसानी से रद्दी की टोकरी में नहीं जाने देगी।

एफडीआई को तो ममता बनर्जी संभाल रही हैं। भ्रष्टाचार जन-जन की लड़ाई का क्षेत्र बन गया है। वे कहते थे कि हम मजबूत लोकपाल बिल लाएंगे। नींव की एक ईंट निकलते ही इमारत अविश्वसनीय हो जाती है, पता नहीं कब भरभरा कर गिर पड़े। उसको बचाना पूरे देश का दायित्व है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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