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चीन के झांसे में बाध्यता न स्वीकार करे भारत

डरबन में चल रही जलवायु परिवर्तन वार्ता में चीन के रुख ने भारत के लिए धर्म-संकट की स्थिति पैदा कर दी है। चीन ने विकसित देशों के उस प्रस्ताव को स्वीकार करने के संकेत दिए हैं, जिसमें वर्ष 2020 के बाद ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए कानूनी संधि की बात है।

भारत ऐसी किसी संधि के खिलाफ था और इसी के चलते उसने स्वेच्छा से कार्बन उत्सर्जन में 20-25 फीसदी की कमी लाने का ऐलान किया। इसके बाद चीन समेत अन्य देशों ने भी ऐसी घोषणा की। इस मुहिम से विकासशील देशों के लिए जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में बढ़ने का रास्ता खुलता है और यह पहल विकसित देशों पर दबाव भी बनाती है। लेकिन अचानक चीन ने सबको चौंका दिया है। चीन के ताजा रुख से बेसिक (ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन) देशों की एकता भी सवालों में घिर गई है।

चीन, अमेरिका के बाद यदि यूरोपीय देशों के समूह को छोड़ दिया जाए, तो भारत दुनिया में तीसरा बड़ा प्रदूषक राष्ट्र है। लेकिन यदि भारत की तुलना चीन के औद्योगिकीकरण से करें, तो हम बहुत पीछे हैं। चीन में औद्योगिकीकरण चरम पर है, जबकि भारत में अभी इसकी रफ्तार बढ़ ही रही है। ऐसी परिस्थितियों में चीन के लिए ऐसे किसी प्रस्ताव को स्वीकार करना संभव है। एक तो सबसे बड़े प्रदूषक होने के कारण उस पर उत्सर्जन में कटौती का दबाव है।

दूसरे, यदि चीन के औद्योगिक विकास को झटका भी लगता है, तो यह उसके लिए बड़ी बात नहीं है। वह काफी कुछ हासिल कर चुका है। जहां तक मौजूदा उद्योगों की बात है, तो उनमें हरित तकनीकों के जरिये (जो संधि मानने पर विकसित देश देंगे) उत्सर्जन में कमी लाना संभव है। जबकि भारत के लिए इस संधि को मानने का मतलब है कि औद्योगिक विकास को ब्रेक लग जाना। भारत में उद्योग जीडीपी का एक अहम हिस्सा हैं। भारतीय उद्योग जगत इतना मजबूत भी नहीं है कि वह हरित तकनीक को अपनाने का भार वहन कर सके।

वैसे इस प्रस्ताव में चीन ने कुछ शर्ते जोड़ी भी हैं। जैसे कार्बन उत्सर्जन का बराबर बंटवारा हो, ग्रीन तकनीक मिले, कानकुन समझौते में जो सौ अरब डॉलर की मदद देने की बात हुई थी, उस पर स्थिति स्पष्ट की जाए, व्यापार से जुड़ी शर्ते सभी देशों में समान हों और क्योटो प्रोटोकॉल की प्रतिबद्धता अवधि आगे बढ़ाएं। लेकिन भारत ने जो सवाल उठाए हैं, वे ज्यादा अहम हैं। कानूनी संधि के दायरे में क्या विकसित देश भी रहेंगे, दूसरे, उत्सर्जन में कटौती इसकी तीव्रता की होगी या फिर मौजूदा स्तर की। इन सवालों के जवाब नहीं मिले हैं। चीन को समर्थन से पहले इन सवालों के जवाब मांगने चाहिए थे। फिर एक बड़ा सवाल यह भी है यूरोप में मंदी का आलम है और अमेरिका पिछली मंदी से अभी तक खुद उबर नहीं पाया है, ऐसे में क्या ये देश विकासशील दुनिया को सालाना सौ अरब डॉलर की मदद देने में सक्षम हैं?

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