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दिल के हुए हजार टुकड़े, कुछ वामपंथी, कुछ दक्षिणपंथी

भारत संवेदनशील लोगों का देश है। यहां के लोगों की भावनाओं को आहत करने के लिए ज्यादा कोशिश करने की जरूरत नहीं है। कई सारे लोग तो अपनी भावनाओं को ठेले पर लेकर घूमते रहते हैं और आवाज लगाते रहते हैं- भावनाएं आहत कर दो, भावनाएं आहत कर दो। उनकी भावनाओं पर अगर फूल की पंखुड़ी भी गिर गई, तो उन पर अच्छा-खासा डैंट पड़ जाता है।

कुछ लोग किताबों में खोजते रहते हैं कि कहीं ऐसी कोई बात मिल जाए, जिससे भावनाएं आहत हो जाएं। ये लोग उर्दू शायरी के आशिकों की तरह हैं, जो दर्दे-दिल पाने के लिए क्या कुछ नहीं कर सकते। कुछ लोग इतनी मेहनत भी नहीं करते, वे दूसरे लोगों से कहते हैं- भाई, जरा देखना कहीं मेरी भावनाएं आहत करने का मैटेरियल मिल रहा हो।

उधर उस व्यक्ति ने किताब में कोई ऐसी बात पढ़ी, और इधर इनकी भावनाएं आहत हुईं। आजकल की सोशल नेटवर्किंग साइट्स काफी जालिम हैं, वे एक साथ करोड़ों की भावनाएं आहत कर सकती हैं। कपिल सिब्बल साहब से पूछिए, वह अपने दर्दे-दिल के लिए गूगल, फेसबुक, ट्विटर कहां-कहां नहीं गए।

दिल तोड़ने वाली बातें भी अलग-अलग रूपों में, आकारों में, कीमतों में उपलब्ध हैं। वामपंथियों का दिल उन बातों से कतई नहीं टूटता, जिनसे दक्षिणपंथियों का टूटता है, हालांकि कई पावरफुल दिल तोड़ने वाले नुस्खे उपलब्ध हैं, जो एक साथ वामपंथियों और दक्षिणपंथियों के दिलों को तोड़ सकते हैं। खुदरा में सीधे विदेशी निवेश का मामला ऐसा ही था। इसने चार बैरल वाली बंदूक का काम किया।

किसी को ‘खुदरा’ से दिक्कत थी, किसी को ‘सीधे’ से, किसी को ‘विदेशी’ से और किसी को ‘निवेश’ से। ये तीर ऐसे सीधे दिल पर लगे कि वामपंथी, वामपंथी न रहे और दक्षिणपंथी, दक्षिणपंथी। दोनों संसद के दरवाजे पर दिल थामकर ऐसे बैठे कि संसद चल न पाई। प्रधानमंत्री का दिल तोड़ने के लिए किसी की जरूरत नहीं है, वह पुरानी फिल्मों के दिलीप कुमार बने हुए हैं।

कपिल सिब्बल के लिए इतना काफी नहीं था। उन्हें ज्यादा बड़ा दर्दे-दिल चाहिए। उन्होंने फेसबुक और ट्विटर के तार छेड़ दिए। फिर क्या था, दर्द भरे आहत गान फूट पड़े। आहत होने के लिए दक्षिणपंथी या वामपंथी होना जरूरी नहीं है, सिर्फ दिल होना चाहिए।
राजेन्द्र धोड़पकर

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