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स्मृतियों की कीमत

‘वे भी क्या दिन थे। चाल में दस लोगों के साथ रहना। खाली जेब इधर-उधर भटकना।’ देवानंद अपने संघर्ष के दिनों के बारे में अक्सर बताते थे। वह उन लोगों में थे, जो स्मृतियों का बोझा नहीं ढोते, लेकिन उसे सीने से चिपकाए रहते हैं। जिंदगी के आखिरी पल तक उससे भरपूर प्यार करते हैं।

फ्रॉम न्यूरॉन टू ब्रेन के लेखक स्टीफन कुफलर का मानना है कि अगर हम अतीत को याद नहीं कर पाते, तो समझिए कि जिंदगी, जिंदगी नहीं। वह यादों को हमारी सर्वश्रेष्ठ योग्यताओं में से एक मानते हैं। उनका कहना है कि स्मृतियां जीवन और व्यक्तित्व के प्रति हमारे नजरिये को विकसित करती हैं और इसके बिना जिंदगी अधूरी है। दरअसल स्मृतियां एक इमोशनल चार्जर की तरह काम करती हैं, जो अक्सर हमारी चेतना में रंग भर हमें ऊर्जावान बनाती हैं।

साहित्यकार ऑस्कर वाइल्ड कहते हैं, ‘स्मृति वह डायरी है, जिसे हम अपने साथ लेकर चलते हैं। यह उन चीजों से जुड़ने का तरीका है, जिन्हें आप प्रेम करते हैं और कभी खोना नहीं चाहते।’ मनोवैज्ञानिक रिचर्ड टेलर की मानें, तो स्मृतियों का नहीं होना मानव हृदय और दिमाग, दोनों की शून्यता का संकेत है। अगर स्मृतियां नहीं हों, तो समस्याओं को सुलझाने से लेकर तार्किक सोच रखने में हम अक्षम साबित होंगे।

स्मृतियों का इतना मूल्य होते हुए भी हमारी कोशिश रहती है कि ऐसी स्मृतियों को मिटा दिया जाए, जो दुख देती हों। फिल्म इटरनल सनशाइन ऑफ द स्पॉटलेस माइंड  में जिम कैरी और केट विंस्लेट अपने प्रेम संबंधों में आई कड़वाहट की यादों को नष्ट कर देना चाहते हैं और इसके लिए यादें मिटाने वाली फर्म की मदद लेते हैं। हो सकता है कि निकट भविष्य में ऐसे फर्म हमारे आसपास भी दिख जाएं। लेकिन हमारी बुरी यादें भी हमें भावनात्मक तौर पर समृद्ध बनाने का काम करती हैं। मनोवैज्ञानिक फ्रेडरिक बार्टलेट भी इस बात  पर हामी भरते हैं कि अगर ऐसा हुआ, तो हमारी सोच का दायरा सिमट जाएगा।
प्रवीण कुमार

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