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रुका हुआ फैसला

खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को बढ़ाकर 51 प्रतिशत करने के मंत्रिमंडल के फैसले को सरकार ने फिलहाल रोक दिया है और आखिरकार संसद का कामकाज शुरू हो गया। यह कामकाज कितने दिन शांति से चलेगा यह बताना मुश्किल है, क्योंकि लोकपाल बिल इसी सत्र में लाया जाना है और उस पर बवाल की पूरी आशंका है।

एफडीआई बढ़ाने के फैसले पर रोक से संसद फिर शुरू हुई यह अच्छा हुआ, लेकिन पहले से ही धीमी होती अर्थव्यवस्था के लिए यह बात अच्छी नहीं है। अगर सरकार अपनी बात मनवाने में कामयाब हो जाती, तो इसका असर सिर्फ खुदरा व्यापार या खेती पर ही नहीं होता, बलिक भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी इसका अच्छा असर होता, निवेशकों में उत्साह जगता और तमाम क्षेत्रों में विकास की गति तेजी होती। फिलहाल लगी रोक से यही धारणा मजबूत होगी कि सरकार फैसले करने और उन्हें अमल में लाने में नाकाम है।

कई देशी-विदेशी निवेशक और विशेषज्ञ कह चुके हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था के शिथिल पड़ने की और निवेश घटने की मुख्य वजह यही धारणा है। एफडीआई बढ़ाने के इस फैसले को इस सरकार का सबसे बड़ा आर्थिक सुधार बताया जा रहा था और यह माना जा रहा था कि इस एक फैसले से अर्थव्यवस्था की गति बदल जाएगी, क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर निवेश आएगा, जिसके दूसरे दूरगामी नतीजे होंगे।

मसलन इससे बुनियादी ढांचे में सुधार होगा, किसान और उपभोक्ता के बीच बिचौलियों की तादाद घटेगी, परिवहन और संग्रहण की स्थितियां सुधरेंगी और बरबादी कम होगी, बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होंगे, खेती के आधुनिकीकरण को बल मिलेगा। अब सरकार का कहना है कि वह पहले आम सहमति बनाने की कोशिश करेगी, राज्य सरकारों और राजनीतिक पार्टियों तथा अन्य पक्षों की राय ली जाएगी, तब इस फैसले को लागू किया जाएगा। जाहिर-सी बात है, यह प्रक्रिया बहुत आसान नहीं है।

यह महत्वपूर्ण फैसला नहीं लागू हो पाया, इसके पीछे सभी पक्षों का दोष है। सरकार का दोष यह है कि उसने पहले दूसरी पार्टियों की सलाह नहीं ली और उनका विश्वास नहीं अजिर्त किया। वामपंथी पार्टियों को छोड़ दिया जाए, जो किसी भी आर्थिक सुधार को जनविरोधी मानती हैं, तो बाकी दलों का विरोध राजनीतिक वजहों से ही था। सरकार अगर मानती थी कि यह फैसला इतना अहम है, तो वह अचानक इसकी घोषणा करने की बजाय कुछ जमीनी तैयारी करके इसकी घोषणा कर सकती थी। हो सकता है कि इसके बाद भी इस फैसले का विरोध होता, लेकिन वह तब प्रतिष्ठा का सवाल नहीं बनता।

दरअसल, बड़ी समस्या यह है कि बिचौलियों, आढ़तियों और खुदरा व्यापारियों की स्थानीय राजनीति में बड़ी भूमिका होती है, उन्हें कोई राजनेता नाराज नहीं करना चाहता। ऐसे में सरकार को अपनी पार्टी और दूसरी पार्टियों को समझाने में थोड़ा वक्त व श्रम खर्च करना था।

एफडीआई बढ़ाने के विरोध में कई ठोस तर्क हो सकते हैं, लेकिन अच्छा होता कि विपक्षी इन तर्कों को संसद में बहस के दौरान पेश करते। संसद न चलने देकर भले ही विपक्षियों ने सरकार पर एक विजय पा ली है, लेकिन देश की जनता की नजर में इससे उनका सम्मान घटा है। इसके बाद सांसद अगर यह शिकायत करते हैं कि उनकी सख्त आलोचना की जाती है, तो यह कितना जायज है? इस पूरे प्रकरण में जनता यह समझ ही नहीं पाई कि सरकार ने क्यों यह फैसला किया और विपक्ष ने क्यों इसका विरोध किया। संसद में बहस होती, तो लोग इसके पक्ष-विपक्ष को सुनते। इस प्रकरण से न भारतीय अर्थव्यवस्था की छवि बेहतर होती है, न ही भारतीय राजनीति की।

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