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गाइड को आखिरी सलाम

फिल्म ‘गाइड’ में अपने किरदार के लिए देव आनंद हमेशा याद आएंगे। एक हीरो के तौर पर उनकी वह भूमिका यकीनन सर्वश्रेष्ठ थी। बीते शनिवार को 88 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। इसके साथ ही बॉलीवुड के इतिहास का एक महान अध्याय भी खत्म हो गया। लेकिन अपने पीछे देव साहब प्रशंसकों की एक ऐसी दुनिया बसा गए हैं, जो उनकी रोमांटिक अदायगी की हमेशा कायल रहेगी।

ऑन या ऑफ एयर विनम्र रहने वाले देव आनंद के चेहरे पर एक स्थायी मुस्कान होती थी। फैशन उनके चाल-ढाल में था। उनकी शख्सियत वाकई सबसे जुदा थी। वह जब तक जिंदा रहे, जवानी, जोश, रोमांस और आकर्षण के प्रतीक रहे। पाकिस्तान से उनका गहरा नाता था। लाहौर के नामचीन सरकारी कॉलेज से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और 1940 में फिल्म स्टार बनने का ख्वाब संजोये हुए वह मुंबई पहुंचे थे। 1946 में उनकी पहली फिल्म ‘हम एक हैं’ आई, जबकि उनके निर्देशन की शुरुआत 1971 में ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ से हुई। इस फिल्म ने हिप्पी कल्चर को गहराई के साथ रुपहले परदे पर दिखाया। टिकट खिड़की पर भी फिल्म कामयाब रही।

देव आनंद अपने समकालीन नायकों राज कपूर और दिलीप कुमार के साथ बॉलीवुड के परदे पर छाए रहे। वह बॉलीवुड का ‘गोल्डेन एज’ था। 60 के दशक तक यह त्रिमूर्ति कायम रही। इसके बाद राज कपूर व दिलीप कुमार मुख्य किरदार से हट गए, पर देव साहब अपनी जिद पर कायम रहे। वह मुख्य किरदार में आते रहे।

ऐक्टिंग से बेपनाह लगाव का ही नतीजा था कि करीब छह दशकों तक सिनेमाई दुनिया में उनकी तूती बोलती रही। उनके खाते में कई बेमिसाल फिल्में आईं। अभिनय व निर्देशन, दोनों क्षेत्रों में। वर्ष 2002 में भारतीय सिनेमा में अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड मिला। उन्हें हिंदी सिनेमा का ऑस्कर कहे जाने वाले फिल्म फेयर पुरस्कार भी कई बार मिले। यही नहीं, देव आनंद की लोकप्रियता विदेश में भी खूब रही। फिल्म-निर्देशन का उनमें जुनून था। निधन से पहले भी वह एक पटकथा पर काम कर रहे थे। उनकी जिंदादिली और फिल्म को लेकर उनका जुनून वाकई सराहनीय है।
डेली टाइम्स, पाकिस्तान

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