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राजनीतिक चालें

इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि अहम फैसलों पर भी राजनीतिक चालें हावी हो जाएं और संसद को चलने न दिया जाए। पहले भी एक पूरा सत्र टू-जी घोटाले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की मांग पर सरकार के हठपूर्ण इनकार ने नष्ट कर दिया था। इस बार खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का मुद्दा था, जिस पर रोक लगवाने के लिए विपक्ष जिद पकड़े बैठा था। इस मुद्दे पर संसद की कार्यवाही बाधित कर यदि विपक्षी दल अपनी जीत का दावा करते हैं, तो यह उनकी भूल ही होगी, क्योंकि यथार्थ यह है कि वे कई जरूरी फैसलों को रोक रहे थे। वैसे केंद्र सरकार को पहले ही विचार-विमर्श करके सर्वसम्मति से निर्णय लेना चाहिए था, पर इस भूल को तूल देना भी सही नहीं था। अगर इस तरह की राजनीति आर्थिक मुद्दों पर की जाती रही, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष कठिनाइयां और बढ़ सकती हैं, बल्कि ऐसे वक्त में तो और एकजुट होकर काम करना चाहिए।
सोनिका गुप्ता
sonika291291gupta@gmail.com

बेमिसाल देव आनंद
देव आनंद अंधकार में गुम होने वाले सितारे नहीं थे। इसीलिए वह हिंदी सिनेमा के आसमान पर जगमगाते रहे। वक्त के साथ हर कलाकार की लोकप्रियता घटने लगती है, लेकिन यह बात देव आनंद के मामले में उचित नहीं है। फिल्मी दुनिया में वह 1946 में आए। राज कपूर और दिलीप कुमार भी उसी दौर में आए। इसके बाद की पीढ़ी के कलाकारों को भी, जिनमें मनोज कुमार और सुनील दत्त के नाम उल्लेखनीय हैं, देव आनंद ने कड़ी टक्कर दी। अमिताभ और धर्मेद्र के दौर में भी देव आनंद की ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ जबर्दस्त हिट रही। फिल्म ‘देस-परदेस’ तक उन्होंने कई हिट फिल्में दीं। उन्होंने कई नए कलाकारों को मौके दिए। ‘गाइड’, ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘बाजी’ जैसी फिल्मों में उनके किरदार को लोग आज भी पसंद करते हैं।
रवींद्र पाठक, करोलबाग, दिल्ली

मैली गंगा-यमुना
देश में गंगा और यमुना को स्वच्छ बनाने के लिए अब तक सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन सब कुछ कागज पर दिखता है। क्योंकि गंगा और यमुना जैसी नदियां अब भी मैली की मैली हैं। खासकर शहरी इलाकों में इन नदियों का काफी बुरा हाल है। उनकी पूरी गंदगी इन्हीं नदियों में बहाई जाती है। दिल्ली में तो यमुना नदी अब नाले के समान हो गई है। बेहतर यह होगा कि सरकार इन नदियों को दूषित होने से बचाने के लिए एक साथ कई स्तरों पर पहल करे। वरना जिस तरीके से देश की कई नदियां सिमटती जा रही हैं, गंगा और यमुना के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगेगा। ऐसे में, आगामी पीढ़ियां गंगा-जमुनी तहजीब का मतलब भी नहीं समझ पाएंगी।
ओमप्रकाश त्रेहन, एन-10, मुखर्जी नगर, दिल्ली

साफ-सफाई में राजनीति
दिल्ली नगर निगम की सत्ता पर काबिज भाजपा अपनी लाख कोशिशों के बावजूद इस महानगर को साफ-सुथरा नहीं रख पा रही है। निगम के ज्यादातर क्षेत्रों की गलियां गंदी हैं। जगह-जगह कूड़े-कचरे के ढेर लगे रहते हैं। कचरा घरों के कूड़े सड़कों पर फैले रहते हैं, जो बदबू फैलाने के साथ-साथ ट्रैफिक में भी बाधा उत्पन्न करते हैं। यमुना पार में पटपड़गंज रोड, सतनाम रोड, गांधीनगर मेन रोड, करावलनगर रोड, खजूरी चौक से शास्त्री पार्क चौक के बीच स्थित पुस्ता सर्विस रोड सहित और भी कई ऐसी सड़कें हैं, जो इस बदहाल स्थिति की गवाही देती हैं। दरअसल, जब तक साफ-सफाई जैसे मामलों में भी राजनीति हावी रहेगी तथा वॉर्ड क्षेत्रों को राजनीति के चश्मे से देखा जाता रहेगा, तब तक स्वच्छ दिल्ली का सपना अधूरा ही रहेगा।
मोली लाल जैन, सूर्या निकेतन, दिल्ली

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