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‘सांप’ लापता, लकीर पीट रही एटीएस

वाराणसी, कार्यालय संवाददाता। साल दर साल धमाके और गिरफ्तारी के नाम पर सिर्फ वलीउल्लाह। धमाकों की जांच में लगी एटीएस का यही रिपोर्ट कार्ड है। बार-बार धमाके कर लापता हो जाने वाले ‘सांप’ के गुजरने के बाद लकीर पीटना इस महत्वाकांक्षी एजेंसी की आदत बन चुकी है।

शीतला घाट ब्लास्ट की जांच में भी फिलहाल एजेंसी के पास कोई खास जानकारी नहीं है। सात दिसंबर-2010 की शाम 6:15 पर शीतला घाट पर धमाके के बाद हमेशा की तरह सुरक्षा और खुफिया तंत्र सक्रिय हो गए। घटनास्थल से साक्ष्य जुटाने की जगह तीन दिनों तक वहां मात्र राजनीतिक दौरे और घोषणाएं छाई रहीं।

हाल यह था कि प्रदेश स्तर की कोई भी एजेंसी धमाके में इस्तेमाल किए गए विस्फोटकों की जानकारी भी नहीं कर सकी। एनआईए के विशेषज्ञ भी खाली हाथ लौटे तो गुजरात से विशेषज्ञों को बुलाया गया। घटना के एक पखवारे बाद पता चला कि धमाके में आरडीएक्स के साथ पांच तरह के प्लास्टिक एक्सप्लोसिव इस्तेमाल किए गए थे।

इसके बाद शुरू हुई तफ्तीश कुल मिलाकर मोबाइल ट्रेसिंग और इलेक्ट्रानिक सर्विलांस पर ही टिकी रह गई। खुफिया तंत्र को पता चला कि धमाके से जुड़े कुछ संदिग्ध चंदौली में आकर रुके थे और धमाके के बाद दशश्वमेध क्षेत्र से चंदौली में एक मोबाइल कॉल की गई थी। उन्होंने दशाश्वमेध में दो दिनों तक खरीदारी के बहाने रेकी की थी। मगर वे कौन थे और कहां से आए थे, इसका सुराग नहीं लगाया जा सका।

मामले को लौंदा झांसी (चंदौली) के शमीम से भी जोड़ने की कोशिश की गई लेकिन तफ्तीश आगे नहीं बढ़ पाई। संकटमोचन धमाके के आरोपित शमीम, बांग्लादेशी मुस्तकीम, जकारिया और बशरुद्दीन अब तक फरार हैं।खुलासा तो दूर शीतला घाट ब्लास्ट सालभर बाद भी तफ्तीश से आगे नहीं बढ़ सकी है। यहां तक कि एजेंसियां धमाके के लिए जिम्मेदार संगठन का भी पता नहीं लगा सकी हैं।

बाकी सारा मामला मुंबई एटीएस और दिल्ली क्राइम ब्रांच के वर्कआउट पर टिका हुआ है। हालत यह है कि दिल्ली में सप्ताह भर पहले पकड़े गए आतंकियों से यूपी एटीएस पूछताछ भी नहीं कर सकी है।

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