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जनता के उठ खड़े होने का साल

अभी दिसंबर का लगभग पूरा एक महीना बाकी है। इस दौरान कोई भी घटना घटती है, तो इसे हम, ‘वर्ष की आखिरी घटना’ कह सकते हैं। हो सकता है कि यह दुखद भी हो। या फिर जिसे हम ‘साल की सुखद झिलमिलाहट’ के तौर पर याद करें। साल अवसान से थोड़ी दूर है, लेकिन कोई भी पीछे मुड़कर यह देख सकता है कि गुजरा वक्त कैसा था? किसने महत्वपूर्ण घटनाओं को अंजाम दिया? और किसने इस साल हमारे विचारों, हमारी उम्मीदों, आशंकाओं और जिंदगी पर असर डाला।

सच्चाई यही है कि ऐसा कोई व्यक्तित्व इस वर्ष उभरा ही नहीं। किसी आम व्यक्ति, खेल जगत का सितारे, वैज्ञानिक, चिंतक, लेखक या नेता ने हमारे दिलो-दिमाग में अपनी छाप नहीं छोड़ी। साल भर बवंडर उठते रहे। कभी आंखें चौंधियाने वाली उपलब्धियों के चलते, तो कभी साहस या राजनीति की दुर्लभ छवियों की वजह से। इस साल किसी की भी ताजपोशी नहीं हो पाई। एक ऐसा मंच, जहां सब एक बोल रहे हों, कोई न तो अभिनेता-अभिनेत्री या विदूषक हो, तो इसे मानव मंच ही कहेंगे। वर्ष 2011 इसी का मंच है। साल भर मानो समूह गान चलता रहा, कलाकार अपने-अपने तरीके से इसे लयबद्ध करते रहे और श्रोताओं ने भी उनकी ताल से ताल मिलाई।

आम लोगों ने ही अरब क्रांति की शुरुआत की। उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जन ज्वार की लहरें ओमान और ट्यूनिशिया होते कई देशों में फैल गई। लेकिन सबके सार एक ही रहे।

इसी तरह अविश्वसनीय ‘ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट’ आंदोलन की शुरुआत करने वालों ने सबको विस्मित कर दिया। उन्होंने ‘कॉरपोरेट जगत के अहंकर’ को धूल-धूसरित किया। मानवीय अनुभवों के साथ कॉरपोरेट जगत को वास्तविक पड़ताल के लिए झुकना ही पड़ा। खुद अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी इस आंदोलन को मान्यता दी। हमारे पड़ोसी म्यांमार में लगभग आधी सदी पुरानी सैन्य सत्ता उखड़ने लगी। बुद्ध की इस पावन धरती पर नागरिक शासन की स्थापना की शुरुआत हो गई है। लोग कहते हैं कि उन्होंने ही इस आबोहवा को बनाया है। लेकिन क्या इसमें नए मौसम हैं और मौसम का मिजाज बदलने से नई व्याधियों से निजात मिल जाती हैं? 

क्या अरब क्रांति को और फैलने की अनुमति दी जाएगी? या इस इलाके के तेल की राजनीति एक नई मौकापरस्ती को जन्म देगी? क्या ‘ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट’ का आंकलन हो सकता है? क्या एक फीसदी अमेरिकी अमीरों को भी इसकी चिंता है? क्या म्यामांर में लोकतंत्र की रहनुमा ऑग सान सू की जैसा चाहती हैं, वैसा करने के लिए आजाद हैं?

चलिए, रुख अब भारत का करते हैं। वर्ष 2011 में किसने हमारी सोच को एक नई दिशा दी और क्या दिशा दी? किसने हमारे अंदर एक नई ऊर्जा को जन्म दिया? जवाब है- अन्ना हजारे। उन्होंने हमारे मन-मस्तिष्क पर अपनी मुहर लगा दी है। यही नहीं, अपने स्पष्ट और जोरदार हाव-भाव से हमें प्रभावित किया। उन्हें महाराष्ट्र से बाहर लोग बमुश्किल ही जानते थे। गैर-सरकारी संगठनों की दुनिया में उनकी अदनी-सी पहचान थी। उनका नाम जमीनी स्तर के नेताओं में शुमार किया जाता रहा, जिन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाया। लेकिन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नेताओं मसलन, बाबा आम्टे, चंडी प्रसाद भट्ट, सुंदर लाल बहुगुणा, अरुणा रॉय या मेधा पाटकर की तुलना में उनकी पहचान स्थानीय स्तर तक ही थी। लोग बस उन्हें ‘रालेगण सिद्धी के सुधारक’ के तौर पर जानते थे।

जैसे ही वर्ष 2011 आया, उन्होंने उस छोटी-सी जगह से ऐसी छलांग लगाई, मानो एक तेंदुए ने राष्ट्र की उदासीनता को अचानक ही धर-दबोचा हो। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल का विचार जनता के दिमाग में घुमड़ रहा था। वैश्विक स्तर पर इस विचार को उत्तरी यूरोप के तीन साम्राज्य (डेनमार्क, नॉर्वे और स्वीडन) के लोगों की अस्पष्ट इच्छा के तौर पर देखा जाता है। जो लोग किवदंतियों पर भरोसा करते हैं, वह इसे पुराने भारतीय राजाओं से जोड़ते हैं, जो अपने राजमहल के बाहर घंटी टंगवाते थे। कोई दुखी व्यक्ति आता था और उस घंटी को बजाकर राजा की निंद्रा को तोड़कर अपनी फरियाद रखता था। इसी तरह, अन्ना हजारे ने लोकपाल को राष्ट्रीय गर्व से जोड़ा। रातोंरात वह अव्वल ‘गेम चेंजर’,‘पेज टर्नर’ और ‘न्यूज मेकर’ बन गए। जनता के साथ जाने का उन्होंने फैसला किया। हालांकि उनकी ‘कोर टीम’ ऐसा नहीं कर पाई।

भारत का मध्य वर्ग ‘डोंट डिस्टर्ब मी’ और ‘आई एम मोबाइल’ के खयालों को जीता है। वे भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं। उनके लिए यह सर्वव्यापी है, जिसने उनकी उम्मीदों को हथिया लिया है। भ्रष्टाचार ने तो कई को मल्टी डिजिट फिगर में पहुंचा दिया है। इसलिए मध्यवर्ग चाहता है कि राजनीति में ऐसा कोई भी नहीं हो, जिसकी वजह से भ्रष्टाचार के मौके बढ़ें। अन्ना हजारे लोगों की जुबां बोल रहे हैं। उन सबकी चेतावनियों को उच्चरित करते हुए वह तनी हुई सामूहिक मुठ्ठियों के प्रतीक हैं।

हालांकि उनके कई आलोचक हैं। वे भी मानेंगे कि अगर अन्ना हजारे नहीं होते, तो लोकपाल बिल को यूं ही ठंडे बस्ते में चला जाता। जाहिर है हजारे नहीं, तो आंदोलन नहीं। इसी तरह अगर लोग नहीं, तो हजारे भी नहीं। साफ है एक बार फिर उत्तर जनता ही है। क्या दूसरे आंदोलनों के भी यही मायने हैं? अन्ना हजारे आंदोलन के तीसरे चक्र का क्या होगा? मुमकिन है कि भारत को अग्नि-परीक्षा के एक और दौर से गुजरना पड़े।

जनता ईंधन की तरह होती है। इसमें दो राय नहीं कि इस बार का भी आंदोलन जनता की अगुआई में ही होगा, लेकिन इसमें अंतर दिखेगा। अक्सर लोकप्रिय विरोध-प्रदर्शन धीरे-धीरे आंदोलन के संस्थापकों के हाथ से निकलकर शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत करने वाले लोगों के पास चला जाता है। उसमें राजनीतिक वार्ताकार उनसे एक बुरी खबर की तरह नहीं भिड़ते हैं, बल्कि कड़वी सच्चई से सामना करवाते हैं। बातचीत से लोगों के गुस्से को एक शांतिपूर्ण आकार दिया जाता है।

बहरहाल, आंदोलन को रंग देने वाले लोगों का मकसद कामयाबी हो, न कि एक और अग्नि-परीक्षा से देश को गुजरवाना। वैसे दो परिस्थितियां ऐसी हैं, जिनसे लगता है कि अन्ना का आंदोलन सफल नहीं हो सकता है। पहली, आंदोलन की अपनी अकड़ और दूसरी, राजनीतिक तबका इसे नाकाम करना चाहता है।

हालांकि वर्ष 2011 अभी तक अंधकार से मौके निकालने का वायदा कर रहा है। लोकपाल मसले का उठना राष्ट्र की चेतना, आम सहमति और रचनात्मकता का प्रतीक हो सकता है। यकीनन यह धन की क्रूरता पर लोकशक्ति के हावी होने का साल है।
( ये लेखक के अपने विचार हैं)

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