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खिलाड़ियों को न बनाएं राजनीति का शिकार

कोई पीटी ऊषा से जाकर पूछे कि खेलों के बहिष्कार का मतलब क्या होता है। 1986 में कॉमनवेल्थ खेलों की मेजबानी एडेनबर्ग, स्कॉटलैंड को मिली थी। दक्षिण अफ्रीका की हिस्सेदारी को लेकर भारत ने इन खेलों का बहिष्कार किया था। तब पीटी ऊषा जबरदस्त फॉर्म में थीं। अगले कॉमनवेल्थ खेलों का मौका आते-आते  उनका कैरियर ही खत्म हो गया। लॉस एंजेलिस ओलंपिक में चौथे नंबर पर रहने वाली पीटी ऊषा कॉमनवेल्थ खेलों में मेडल नहीं जीत पाईं। ऐसा ही कहानी कीनिया के एथलीट हेनरी रोनो का भी था। जिस एथलीट ने 81 दिन में चार बार विश्व रिकॉर्ड तोड़ने का कारनामा किया, उसके नाम के साथ ओलंपियन नहीं जुड़ सका।

आज फिर एक बार हालात ऐसे ही बनाए जा रहे हैं। डाउ केमिकल के 2012 ओलंपिक से जुड़ने को लेकर बवाल मचा हुआ है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित कई नेता और कुछ पूर्व ओलंपियन इस बात की वकालत कर रहे हैं कि भारत को साल 2012 लंदन खेलों का बहिष्कार करना चाहिए। भोपाल में जगह-जगह लंदन ओलंपिक खेलों की आयोजन समिति के मुखिया सेबेस्टियन के पुतले फूंके जा रहे हैं। तर्क यह है कि जिस कंपनी की वजह से भोपाल में हजारों जाने गईं, उसका विरोध करना ही चाहिए।

डाउ केमिकल 2012 ओलंपिक के टॉप 10 ग्लोबल प्रायोजकों में एक है। रसायन और कीटनाशक बाजार की दुनिया की इस दूसरी बड़ी कंपनी ने प्रायोजन में 70 लाख पाउंड खर्च किए हैं, इससे अब वह ओलंपिक स्टेडियम में अपने विज्ञापन लगा सकेगी। डाउ केमिकल्स का कहना है कि भोपाल गैस कांड की दोषी यूनियन कार्बाइड है, वह नहीं।

बहिष्कार की बंदूक चलाने के लिए एक बार फिर खिलाड़ियों का कंधा इस्तेमाल किया जा रहा है। लगभग तीन दशक में गैस कांड के दोषियों को लेकर जो काम तमाम सरकारें नहीं कर पाईं, उस काम के लिए खिलाड़ियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन खिलाड़ियों का जिन्होंने चार साल तक खेलों के महाकुंभ में हिस्सा लेने के लिए कड़ी मेहनत की। कई एथलीट ऐसे भी हैं, जो साल 2012 में ओलंपिक खेलों में आखिरी बार अपनी दावेदारी पेश करेंगे। उनकी उम्र इस बात की इजाजत नहीं देती कि वे साल 2016 ओलंपिक खेलों का इंतजार करें। ऐसे एथलीटों से जाकर किस मुंह से कहा जाएगा कि जो काम हमारी सरकारें करने में नाकाम रही हैं, उसे आप करिए।

भोपाल गैस त्रासदी पूरे देश के लिए एक कभी न भूल पाने वाली दुर्घटना है, ऐसी घटना दुनिया के किसी भी कोने में हो, उसकी निंदा की जानी चाहिए। दोषियों को सजा दिलाने या पीड़ितों के लिए उचित मुआवजे की मांग करने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन उसके लिए उन खिलाड़ियों के कंधे पर बंदूक नहीं रखनी चाहिए, जो देश को मेडल दिलाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं।  
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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