DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आदत दुख और सुख की

दुख तो अपना साथी है, यह कहने वाले आपको कई मिल जाएंगे। जो ज्यादा निराश होते हैं, वह कहते हैं कि उनकी किस्मत में दुख ही दुख है, सुख कभी-कभार उनको छूकर निकल भर जाता है। अगर आप उन्हें यह समझाएं कि, वह जैसे हैं, उसका कारण उनकी अपनी यह सोच ही है। वह खुद को खुश मानेंगे, तो खुश रहेंगे। दुखी मानेगे, तो दुखी रहेंगे। इस पर जवाब आएगा, वह कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि दुखी रहना तो उनकी फितरत है, यह तो उनका स्वभाव है।

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर जोसेफ जे लुइसियानी मानते हैं कि दुखी रहना किसी का स्वभाव नहीं होता, दरअसल यह लोगों की आदत होती है। लोग जब लंबे समय तक दुखी रहते हैं, तो उन्हें लगने लगता है कि यही उनकी किस्मत है या यही उनका स्वभाव है। आपको दो तरह के लोग दिखेंगे। एक वह जो हमेशा दुखी रहते हैं और दूसरे वह जो हर हाल में खुश रह लेते हैं। दरअसल, यह मामला उनकी आदत का है। उनके स्वभाव या उनकी किस्मत का नहीं। तो सुखी रहने का फॉमरूला यह हुआ कि हम खुश रहने की आदत डाल लें।

जाहिर है कि यह कहना जितना आसान है करना उतना ही मुश्किल है। डॉक्टर लुइसियानी मानते हैं कि अगर हम कोशिश करें, तो खुद को खुश रहना सिखा सकते हैं। वह मानते हैं कि जिस तरह दुखी रहने की आदत पड़ जाती है, उसी तरह खुश रहने की आदत भी डाली जा सकती है। बस पहले तरह की आदत अपने आप पड़ जाती है जबकि दूसरे तरह के लिए कोशिश करनी पड़ेगी। इसकी शुरुआत में हमें यह विश्वास करना पड़ेगा कि हम खुद को खुश रहना सिखा सकते हैं, यानी खुद को एक नई जीवन शैली सीखने के लिए तैयार करना पड़ेगा। फिर धीरे-धीरे जब खुशियां आपका दरवाजा खटखटाने लगें और आप उनके स्वागत के लिए दिल के दरवाजे खोलने लगें, तो इनकी आदत भी अपने आप बनने लगेगी। कोई भी दुखिया इसी रास्ते से सुखिया बन सकता है।
ज्ञानेंद्र

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:आदत दुख और सुख की