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समीक्षा और सवाल

सिनेमा का अर्थशास्त्र ऐसा अंधेरा कोना बन गया है, जहां आलोचकों की नजर नहीं जाती (जाती भी होगी, तो लेखन की शक्ल अख्तियार नहीं करती) और सिनेमा उद्योग इस पर बात नहीं करना चाहता। हिंदी सिनेमा ने बेशक अपने ऊपर इंडस्ट्री का तमगा लगा लिया हो, पर आलोचना उसके उत्पाद को आज भी कलाकृति की तरह देख रही है। अब भी सिनेमा की बहसें दर्शक पर केंद्रित हैं, जबकि वह अरसे से उपभोक्ता है।

सिनेमा को कला और उपभोक्ता को दर्शक बनाए रखना, इंडस्ट्री का फॉर्मूला होता है, जहां भ्रम को यथार्थ की तरह पेश किया जाता है। पर इसी अवधारणा को आलोचना भी स्वीकार कर ले, तो क्या कहा जाए? यह सच है कि फिल्म में कैमरे की भाषा का सबसे ज्यादा महत्व होता है, पर इस देश में जहां बड़ा वर्ग पाइरेटेड सीडी के जरिये फिल्म देखता है, वहां कैमरा एंगल, सिनेमेटोग्राफी, साउंड की बात की जाए, तो बेमानी है। तीस रुपये में छह फिल्म देखने वालों के लिए यूं भी ‘एस्थेटिक्स’ उतना मायने नहीं रखता।

एक फिल्म को बनाने में जब करोड़ों रुपये खर्च हों, तो दर्शकों का ध्यान रखा जाएगा या शेयर होल्डरों का? मनोरंजन उद्योग में सबका मुनाफा आपस में जुड़ा रहता है, इसलिए कहानी, संगीत, कंटेंट वहीं तक जरूरी होते हैं, जहां तक वह बाजार में बिकने में मदद कर सकें। फिल्म समीक्षा का इन बिंदुओं पर बात करते रहना इंडस्ट्री के मुनाफे से जुड़ा एक काम है। फिल्म उद्योग ने जिस चालाकी से मीडिया को खुद में मिलाया है, वह मार्केटिंग का बेहतरीन नमूना है।
मोहल्ला लाइव में शुभम श्री

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  • Web Title:समीक्षा और सवाल