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इंटरनेट को बांधना

केंद्रीय दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने गूगल और फेसबुक जैसी इंटरनेट कंपनियों से कहा है कि वे अपनी साइट्स पर आपत्तिजनक सामग्री को जांचने और हटाने की व्यवस्था करें। कपिल सिब्बल ने संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में और कुछ धार्मिक नजरिये से आपत्तिजनक सामग्री के संदर्भ में यह बात कही। सरकार यह भी चाहती है कि आपत्तिजनक सामग्री को जांचने के लिए यांत्रिक या तकनीकी व्यवस्था न हो, बल्कि ऐसे लोग हों, जो यह निर्धारित करें।

कपिल सिब्बल को अगर कुछ सामग्री आपत्तिजनक लगती है, तो यह बिलकुल जायज है, इंटरनेट पर अक्सर ऐसी सामग्री होती है या सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ऐसी टिप्पणियां पढ़ने को मिलती हैं, जो किसी को भी आपत्तिजनक लग सकती हैं। लेकिन कपिल सिब्बल जिस तरह चाहते हैं, उस तरह से उसका निदान नहीं हो सकता। इंटरनेट के कंटेंट की पूरी तरह निगरानी करना व्यावहारिक नहीं है, जब चीन जैसा अधिनायकवादी देश यह नहीं कर पाया या अरब देशों की तानाशाही व्यवस्था में सोशल नेटवर्किग साइट्स विद्रोह को भड़काने में सहायक हो गईं, तो भारत के लिए भी यह मुमकिन नहीं है।

एक अनुमान के मुताबिक सोशल नेटवर्किग साइट्स पर हर साल 360 करोड़ टिप्पणियां होती हैं, अगर इनका बहुत छोटा प्रतिशत भी भारत से आता है, तो भी इसे जांचना नामुमकिन है। इंटरनेट कंपनियों ने भी कपिल सिब्बल से यही कहा कि इस तरह की जांच व्यावहारिक रूप से मुमकिन नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी इतनी तेजी से आगे बढ़ी है कि सामाजिक, राजनीतिक तंत्र उसके साथ कदम नहीं मिला पाए हैं।

भारत में लोकतंत्र की जड़ें पिछले 60-65 साल में काफी गहरी हुई हैं, लेकिन कई मामलों में हम सामंती मूल्यों से बंधे हुए हैं। लोकतंत्र के साथ अभिव्यक्ति की आजादी अनिवार्य तौर पर आती है और सिद्धांतत: हम सब इसके प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं, लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी का दायरा जब सामने दिखता है, तो हम असहज हो जाते हैं। भारत में जो राजनीतिक पार्टियां या धार्मिक और जातिगत संप्रदाय किसी के किसी बयान पर या अभिव्यक्ति पर दंगे करने पर उतारू हो जाते हैं या उसे हटाने की मांग करते हैं, इसके पीछे यही पुरानी समझ है। यह हम स्वीकार नहीं कर पाते कि अभिव्यक्ति की आजादी के साथ बहुत कुछ ऐसा आएगा, जो कि हमें आपत्तिजनक लगेगा, पर उसे बर्दाश्त करना ही सही होगा। लोकतंत्र की यह अनिवार्य कीमत है।

परंपरागत माध्यमों में अभिव्यक्ति को लेकर ही जब हमारे यहां इतना बवाल होता है, तो आधुनिक संचार साधनों की व्यापकता ज्यादा मुश्किलें खड़ी करती है, क्योंकि उन्हें नियंत्रित करना तकरीबन हवा को बांधने जैसा है। सोशल नेटवर्किग साइट्स की लोकप्रियता इसीलिए है कि उसमें लोगों को खुलकर अपनी बात करने और लोगों तक पहुंचाने का मौका मिलता है। यह मौका मिला है, तो इसका कुछ दुरुपयोग भी होगा। हम चाहें या न चाहें, सूचना प्रौद्योगिकी हमारे वक्त की एक सचाई है और उसे उसकी तमाम अच्छाइयों-बुराइयों के साथ स्वीकार करना ही होगा। इसमें कभी कुछ अशोभनीय भी हो जाता है, लेकिन उससे लोकतंत्र का कोई नुकसान नहीं होता।

अगर सिब्बल अमेरिकी राष्ट्रपति के बारे में इंटरनेट पर सर्च करें, तो उन्हें बहुत ज्यादा आपत्तिजनक सामग्री मिल सकती है, लेकिन न उससे अमेरिकी राष्ट्रपति की गरिमा कम हुई, न ही इन देशों का लोकतंत्र कमजोर हुआ। नए जमाने के नए तौर-तरीकों और नई टैक्नोलॉजी के साथ ताल मिलाना मुश्किल है, लेकिन आखिरकार यही करने में भलाई है।

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