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यातना शिविरों की स्थिति

बंदियों को लंबे वक्त तक अमानवीय यातनाएं देने की कई रिपोर्ट आई हैं। यातना शिविरों में उनकी बर्बर पिटाई होती रही है। कभी-कभार तो उन्हें इलाज के बिना मरने तक के लिए छोड़ दिया जाता था। तब, साल 2009 में ओबामा प्रशासन ने देश के अप्रवासी यातना शिविरों का हुलिया बदलने की घोषणा की। उस वक्त जेल व जेल जैसी संस्थाओं में कम से कम चार लाख ऐसे बंदी थे, जो रिहाई व अपने देश जाने की बाट जोह रहे थे। होमलैंड सिक्युरिटी की सचिव जानेट नपोलिटानो ने भी इस पूरी व्यवस्था को खारिज किया था।

उन्होंने माना था कि कई बंदियों के बर्ताव मुजरिम की तरह नहीं है और उनसे देश-समाज को कोई खतरा भी नहीं है। इसके बाद नपोलिटानो ने लोगों को भरोसा दिलाया कि यातना शिविरों में दंडात्मक कार्रवाई घटेगी। बंदियों को खुली हवा में सांस लेने की इजाजत मिलेगी और उनके आत्म-सम्मान का हनन नहीं होगा। बावजूद इसके पिछले दो वर्षों में नाम मात्र के सुधार हुए। ह्यूमन राइट्स फर्स्ट की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक अब भी आधे लोग बेवजह जेल में बंद हैं। अनुपात वही हैं, जो 2009 में थे।

हालांकि आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन निदेशालय ने अपनी पाबंदियों को घटाया है। फिर भी महज 15 फीसदी बंदी ही अपने घर लौट सके हैं। बाकी की दुनिया जेल की वर्दी व कांटेदार तारों के बीच सिमटी है। दरअसल, नए मानक बनाए ही नहीं गए हैं, जिससे अधिकारी जेल में सुधारवादी कार्यक्रमों को तरजीह दें। कई आलोचकों ने तो इस तंत्र में कानूनी संरक्षण व पारदर्शिता की कमी को महसूस किया है।

एक तो बंदियों की भारी तादाद, ऊपर से आव्रजन अदालतों में उनके प्रतिनिधियों का अभाव। जाहिर है, ठोस कदम जरूरी हैं। संघीय सरकार को अपने वायदों पर खड़ा उतरना होगा। तभी जाकर बंदीगृह की हालत सुधरेगी। दूसरे वैकल्पिक रास्तों पर भी जोर देना होगा। बंदी अपनी मांगों व अधिकारों के लिए अदालत तक पहुंच सके, ऐसा माहौल बनाना ही होगा। यही नहीं, वक्त-वक्त पर इस पूरे तंत्र की समीक्षा होनी चाहिए। वैसे अब तक जो हुआ है, वह काफी निंदनीय है।     
द न्यूयॉर्क टाइम्स, अमेरिका

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