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प्यार नहीं पा सकी तो डॉक्टर ने आत्महत्या की

 गाजियाबाद। कार्यालय संवाददाता। प्यार नहीं पा सकी तो इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज (इहबास) की पूर्व महिला डॉक्टर ने सोमवार सुबह साहिबाबाद इलाके में ट्रेन के आगे कूद कर जान दे दी। खुदकुशी करने से पहले उसने अपने प्रेमी को मोबाइल से एक मेल भेजा, जिसमें प्रेमी को दोषी ठहराया गया है। उसने खुद को बेबस बताते हुए खुदकुशी ही एक मात्र रास्ता बताया। पुलिस ने लखनऊ निवासी उसके घरवालों को घटना की सूचना दे दी है। महिला डॉक्टर के पिता अवध यूनिवर्सिटी में रीडर हैं। पुलिस के अनुसार, सोमवार सुबह करीब आठ बजे साहिबाबाद इलाके के राजेंद्र नगर औद्योगिक क्षेत्र के पास एक युवती ट्रेन के सामने कूद गई। इससे युवती का सिर धड़ से अलग हो गया। स्थानीय लोगों ने मामले की सूचना पुलिस को दी। पुलिस ने शव के पास से मिले कागजात व मोबाइल से डॉ. अंकिता शुक्ला (30) पुत्री राजेंद्र शुक्ला के रूप में उसकी पहचान की। पुलिस ने बताया कि डॉ. अंकिता शहादरा स्थित इहबास में ज्यूनियर रेजिडेंट्स रह चुकी थी।

वह करोल बाग के पास पीजी हॉस्टल में रह रही थीं। डॉ. अंकिता का परिवार एमएम 3/260, विनय खंड, गोमती नगर लखनऊ में रहता है। अंकिता के पास जो मोबाइल फोन बरामद किया गया है, उसमें एक दर्जन ईमेल रतन नामक शख्स को भेजे गए हैं। रतन का पूरा नाम रत्नेशवर झा है और वह मूलत: काशीपुर, उत्तराखंड का रहने वाला है। प्रथम दृष्टया जांच में पता चला कि डॉ. अंकिता शादी डॉट कॉम के जरिए रतन से मिली थी। वह उससे बेहद प्यार करती थी और शादी भी करना चाहती थी। मगर किसी बात पर रतन उसे इग्नोर कर रहा था। वह बात नहीं करना चाहता था। रतन मैक्सिको में है और वह उसे भारत बुला रही थी। डॉ. अंकिता इंटरनेट के जरिए वेबकैमरे से अक्सर बात करती थी। जांच के दौरान यह भी पता चला कि रतन व उसके घर वाले डॉ. अंकिता को पसंद नहीं करते थे। वह नहीं चाहते थे कि इन दोनों की शादी हो। मामले की जांच कर रहे अधिकारी धर्मेद्र राठौर ने बताया कि शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया।

डॉ. अंकिता और रतन के मेल को ट्रेश किया जा रहा है।रतन को रविवार शाम 4.52 बजे भेजा गया मेलआई विल किल माई सेल्फ ‘समझ में आ गया है तुम बुझदिल हो, मगर मैं नहीं। आई विल किल माई सेल्फ टू प्रूव माई लव। तुम चाहे जितनी कसमें खाओ, तुम दोषी हो और उसकी सजा तुम्हें दूंगी। मैं जान दे रही हूं इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।

अब तुम्हारे पास न कोई मेल आएगा और नहीं कोई फोन।’डॉ. अंकिता

डिप्रेशन की बीमारी सबसे ज्यादा खतरनाक है। जो कदम जिसे डॉ. अंकिता ने उठाया वह काफी डिप्रेशन में रहने के बाद उठाया होगा। हताशा का केवल यही उपचार है कि जिस बात से हताश हों उससे आगे बढ़कर सोचना चाहिए।

-डॉ. समीर पारिख, मनोवैज्ञानिक-

मानसिक रोग अस्पताल में 6 माह की थी नौकरी अंकिता शुक्ला इहबास में जूनियर रेजीडेंट्स थीं। यहां पर उसकी 6 माह के लिए नियुक्ति हुई थी। संस्थान के निदेशक निमेश जी. देसाई बताते हें कि छह माह के दौरान उसने पूरी लगन के साथ नौकरी की। कार्यकाल पूरा होने के बाद वह यहां से चली गई थी। छोटी दीवाली के बाद से कोई संपर्क नहीं हुआ शव की पहचान करने वाली आशा सोनी बताती हैं कि है अंकिता उनके पड़ोस में पेइंग गेस्ट के तौर पर रहती थी। करीब चार माह पहले यहां से छोड़कर कहीं और चली गई थी। इसके बावजूद वह यहां इधर आती रहती थी। उन्होंने बताया कि आखिरी बार छोटी दिवाली के दिन मुलाकात हुई। वह यहां पर लगने वाले मंगल बाजार से खरीदारी करने आई थी।

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