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खामोशी से अयोध्या को बदल रहीं पीढ़ियां

यतीन्द्र मिश्र चर्चित कवि हैं और अयोध्या के राजघराने से तालुक रखते हैं।

मिथक और इतिहास की संधि पर खड़ा अयोध्या शहर हर वर्ष 6 दिसंबर के दिन कुछ इस तरह प्रासंगिक बन जाता है, जिसके कारण इस दिन ठीक से इस तथ्य का आकलन नहीं किया जा सकता कि इस तारीख से अलग अयोध्या का वजूद क्या है। बाबरी ध्वंस, अयोध्या के आम शहरी के लिए ऐसी त्रासद सच्चाई है, जिसे दो दशक बाद भी यहां का नागरिक जीने के लिए लगभग मजबूर है। बार-बार एक आम अयोध्यावासी को हलफनामा देने की शक्ल में यह कहना पड़ता है कि उनका शहर बिल्कुल दूसरे छोटे कस्बों और शहरों की तरह अपनी संभावनाओं और आकांक्षाओं को जीने के लिए संघर्ष करता हुआ एक सहमा-सा निदरेष शहर है। लेकिन समय से साथ आगे बढ़ती नई पीढ़ियां खमोशी से अपने शहर को बदलने में जुटी हैं। 

जो लोग अयोध्या के बाहर रह रहे हैं, वह इस बात का कतई अंदाजा नहीं लगा सकते कि बाबरी ध्वंस के समय अबोध बच्चे की जो पीढ़ी चार-पांच से सात-आठ वर्ष के बीच की थी, वह अब बिल्कुल आधुनिक युवा के तौर पर तैयार होकर अपने जीवन समर में उतर चुकी है। पच्चीस-तीस पार पहुंच चुके बच्चे पिछले दो दशकों में अपनी मेहनत व लगन से देश भर के तमाम महवपूर्ण ओहदों पर डाक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, कलाकार एवं प्रशासनिक अधिकारी तक बनते रहे हैं। यह शहर अभी मरा नहीं है, न ही फीका पड़ा है और न ही किसी प्रकार से उदास या हतप्रभ है।

इसे पता है कि उसके पास परंपरा की ऐसी दुर्लभ थाती है, जिसमें हजरत बड़ी बुआ साहिबा, गोस्वामी तुलसीदास, मीर अनीस, पखावजी पागलदास, बेगम अख्तर और ढेरों रसिक भक्तकवि एवं निर्गुणिए अपनी बोली-बानी के साथ मौजूद हैं।

 

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  • Web Title:खामोशी से अयोध्या को बदल रहीं पीढ़ियां