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भगवद्गीता में है भक्ति और कर्म योग का सुंदर समन्वय

मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही मोक्षदा एकादशी कहते हैं। इस दिन ‘गीता जयंती’ भी मनाई जाती है। इस दिन कुरुक्षेत्र की रणस्थली में कर्म से विमुख हुए अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया था। गीता को संजीवनी विद्या की संज्ञा दी गई है। गीता के जीवन-दर्शन के अनुसार-आत्मा अमर है।

कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा था, ‘‘मैं युद्ध नहीं करूंगा। अपने बंधु-बांधवों तथा गुरुओं को मारकर राजसुख भोगने की मेरी इच्छा नहीं है।’’ कैसी विडम्बना है कि यही अर्जुन कुछ क्षण पूर्व कौरवों की सारी सेना को धराशायी करने के लिए संकल्प कर चुके थे। ऐसे में कर्तव्यविमुख अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने जो उपदेश दिया था, वही गीता है।

गीता की गणना, विश्व के महान ग्रंथों में की जाती है। गीता अमृत है। इस अमृत का पान करने से व्यक्ति अमर हो जाता है। गीता का आरंभ, धर्म से तथा अंत कर्म से होता है। गीता मनुष्य को प्रेरणा देती है। ‘मनुष्य का कर्तव्य क्या है?’ इसी का बोध कराना गीता का परम लक्ष्य है। भारत में जितनी भी विभूतियां हुई हैं, सबने गीता का पाठ किया है। किसी ने उससे ‘कर्म योग’ लिया तो किसी ने ‘अनासिक्त योग’। इसी आधार पर अर्जुन ने स्वीकारा था, ‘‘भगवान! मेरा मोह क्षय हो गया है। अज्ञान से मैं ज्ञान में प्रवेश पा गया हूं। आपके आदेश का पालन करने के लिए मैं कटिबद्ध हूं।’’

गीता में कुल अठारह अध्याय हैं। महाभारत का युद्ध भी अठारह दिन तक ही चला था। गीता के कुल श्लोकों की संख्या सात सौ है। भगवद्गीता में भक्ति तथा कर्म योग का सुंदर समन्वय है। इसमें ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। ज्ञान की प्राप्ति पर ही मनुष्य की शंकाओं का वास्तविक समाधान होता है। इसलिए गीता सर्वशास्त्रमयी है।

श्रीकृष्ण का मनुष्यमात्र को उपदेश है- कर्म करो। तुम्हारा कर्तव्य, कर्म करना ही है। फल की आशा मत करो। फल को दृष्टि में रखकर भी कर्म मत करो। कर्म करो, पर निष्काम भाव से। फल की इच्छा से कर्म करने वाला व्यक्ति विफल होकर दु:खी होता है। अस्तु लक्ष्य की ओर प्रयासरत रहना ही अच्छा है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुभरूर्मा ते संगोस्त्वर्मणि।।

इस प्रकार गीता ‘सर्वभूतेहितेरता’ बनने के लक्ष्य को उजागर करती है।
इस दिन श्री गीताजी, श्रीकृष्ण, व्यासजी आदि का श्रद्धापूर्वक पूजन करके गीता जयंती का समारोह मनाना चाहिए। गीता पाठ तथा गीता प्रवचन-व्याख्यानादि का आयोजन करना चाहिए। इसका सदा ही शुभ फल प्राप्त होता है।
अर्जुन के मोह क्षय की भांति इससे सभी श्रद्धालुओं के मोह व पापों का क्षय हो जाता है, इसलिए यह मोक्षदा है।

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