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कोहरे की कहानी में कुछ दिखता ही नहीं

कोहरा रोग नहीं, मौसमी खुमार है। इसमें अच्छे-अच्छे दब जाते हैं। कैसी भी आंखें हों। काना नहीं, यह कोहरा तो डायरेक्ट अंधा करता है। अरे आदमी की तो बिसात ही क्या, पूरी ट्रेन रुक जाती है। रास्ता चालू है, मगर रास्ता दिखता नहीं। आसमानी सुल्तानी गाढ़ा कोहरा ‘क्लायमेट’ पर भी निर्भर है। बड़े-बड़े तीसमार खां हवाई जहाज भी नीचे उतर आते हैं। बतर्ज ‘आसमान में उड़ने वाला मिट्टी में मिल जाएगा’ का हश्र भी सामने रहता है। कोहरा शीत में आता है और आंधी तूफान के समय भी। स्थायी रूप से शीतकाल में जमा रहता है। क्षितिज से सर तक असर करता है। कोहरा सूखा-गीला क्लायमेट पर आधारित रहता है। निदान का कोई उपाय है ही नहीं, सिवाय रडार के। वैसे हवा चले, तो नौ दो ग्यारह हो जाता है। बेचारे का आकार तो है, मगर हाथ-पांव नहीं, इसलिए उखड़ जाता है। कोहरे के कारण तेजस्वी सूर्य भी विवश दिखता है। या कहो दिखता ही नहीं कभी-कभी।

धुंध को दर्शन से भी जोड़ा जाता है। ‘एक धुंध से आना है एक धुंध में जाना है।’ यूं अंधाधुंध परिभाषाएं हैं। जिंदगी भी तो अंधाधुंध हो गई है। कुछ न दिखे, ऐसी धुंध हो गई है। इसके बाद का दौर अंधा युग, अंधा कानून तक आ गया है। शीतकाल यानी जाड़ा व्यक्ति की हालत पतली कर देता है। ऊपर से कपड़े, दस कपड़े तन पर चढ़े रहते हैं। जमीन तो ठीक, आसमान पर कोहरे की पर्त चढ़ी रहती है। पृथ्वी पर वायुमंडल का आवरण चढ़ा रहता है। इससे गुरुत्वाकर्षण रहता है, वरना उसके बगैर चील कौए की तरह सब चीजें उड़ती फिरें। कोहरे के बिना चित्रकार का चित्र पूरा नहीं होता। गरमी में धूल उड़ती है, वह भी टुकड़े-टुकड़े में धुंध ही है। धुंध, धुंध पर चर्चा करते हुए मेरा चश्मा, जो सही नंबर का होकर भी अक्षर धुंधले करके दिखा रहा है। अब पेन कागज भी लेखन से इनकार कर रहे हैं। धुंध अंधेरे की तरह हावी हो गई है। हम न तो अंधेरा कायम रहे, पर या धुंध कायम रहे के पक्षधर हैं। इसलिए रोशनी की जय बोलकर आंखों की हिफाजत की खातिर चश्मा हटाकर आराम करते हैं। आपसे क्षमा आप सक्षम हैं, तो दूसरा कॉलम देखें।

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