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सदाबहार देव साहब

किताबों, पत्रिकाओं, फिल्मों और विचारों से भरे दफ्तर के कमरे में बिना नागा हर दिन देव आनंद आते थे। फोन खुद उठाना व खास अंदाज में ‘हलो’ के साथ स्वागत करना मूड न हो, तो कहते थे देव साहब अभी नहीं हैं। बाद में फोन कर लें। अगर आप उनकी आवाज पहचानते हों, तो उनके इस इनकार से नाराज नहीं हो सकते थे, क्योंकि वह जब बातें करते थे, तो बेहिचक लंबी बातें करते थे। अपनी फिल्मों की रिलीज के समय वह सभी को बुलाते थे। पत्रकारों को नाम से याद रखते थे। बातचीत के दरम्यान वह कई दफे हथेली थाम लेते थे।

उनकी पतली, जीर्ण होती उंगलियों व नर्म हथेली में गर्मजोशी रहती थी। वह अपनी सक्रियता और संलग्नता की ऊर्जा से प्रभावित करते थे। इस उम्र में भी उनमें एक जादुई सम्मोहन था। अपने बड़े भाई चेतन आनंद से प्रेरित होकर उन्होंने फिल्मों में कदम रखा। नवकेतन की पहली ही फिल्म अफसर की असफलता से उन्होंने मनोरंजन की महत्ता को समझ लिया। बाद में बाजी की सफलता ने उनके विश्वास को पक्का कर दिया। अपने समकालीन राज कपूर और दिलीप कुमार से अलग उन्होंने शहरी युवक की ज्यादा भूमिकाएं निभाईं। ऐसा शहरी युवक, जो समाज के स्याह हाशिये पर रहता है व अपने सरवाइवल के लिए गैरकानूनी काम करने से भी नहीं हिचकता। आज के स्याह व ग्रे चरित्रों से भिन्न उनकी फिल्मों के नायकों का एक सामाजिक आधार व लॉजिक रहता था। 88 की उम्र में भी कुछ नया करने के लिए बेताब देव आनंद का दिल हमेशा जवान रहा।
चवन्नी चैप में अजय ब्रह्मात्मज

 

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