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भविष्य की रणनीति

कुछ दिन बाद भारत, जापान और अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच वाशिंगटन में एक संयुक्त बैठक होने वाली है, जिसमें पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र की नौसैनिक सुरक्षा और परमाणु निरस्त्रीकरण पर चर्चा होगी। बैठक का प्रस्ताव जापान से आया था और पहले यह बैठक टोक्यो में आठ अक्तूबर को होनी थी, लेकिन अमेरिका के अनुरोध पर यह स्थगित कर दी गई थी। साफ तौर पर यह नहीं कहा जा रहा कि इस बैठक में चीन की आक्रामकता प्रमुख विषय होगी, पर यह साफ है कि ये तीनों देश चीन से होने वाले खतरे के बारे में ही खास तौर पर चर्चा करेंगे। चीन की सामरिक और आर्थिक ताकत के बारे में किसी को शक नहीं है और उससे आशंकित होने की भी जरूरत नहीं होती, अगर चीन अपने आस-पास के देशों के खिलाफ आक्रामक नहीं होता। समस्या यह है कि चीन लोकतांत्रिक देश नहीं है, इसलिए उसके बारे में ज्यादा जानना संभव नहीं है और आधिकारिक सूत्रों से जो बताया जाता है, उसी से कुछ अंदाज लगाया जा सकता है। चीन इस क्षेत्र के तमाम देशों के खिलाफ घेरेबंदी की रणनीति अपनाए है, खास तौर पर भारत को वह घेरने की कोशिश में है। जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड जैसे देश भारत से ज्यादा करीबी बनाना चाहते हैं, क्योंकि एशिया में अगर कोई देश चीन को चुनौती दे सकता है, तो वह भारत है। भारत लोकतांत्रिक देश है और महाशक्ति होने की भले ही उसकी भी महत्वाकांक्षा हो, पर उसकी विदेश नीति में आक्रामकता नहीं है, यहां तक कि वह चीन के प्रति भी आक्रामक नहीं दिखना चाहता। भारत से संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही जापान ने भारत के साथ कई महत्वपूर्ण समझौते किए और अपने पुराने आग्रहों को छोड़कर भारत के साथ परमाणु सहयोग भी स्वीकार किया। इस संयुक्त बैठक के तुरंत बाद 28 दिसंबर को जापान के प्रधानमंत्री योशिको नोडा भारत की यात्रा करेंगे। इस दौरान सुरक्षा संबंधी शोध में सहयोग पर भी विचार होगा। अमेरिका के लिए यह ज्यादा स्वाभाविक है कि वह भारत और जापान जैसे देशों के साथ सहयोग करे। संभव है कि बाद में ऑस्ट्रेलिया  व दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ सहयोग पर भी विचार हो।

चीन की नजर इस वक्त रणनैतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों पर है। हिंद महासागर से चीन की सीमा नहीं मिलती, लेकिन हिंद महासागर चीन की रणनीति में बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि चीन का समुद्री व्यापार इसी के जरिये होता है। जहां चीन मध्य एशिया से तेल और अफ्रीकी देशों से खनिज लाने के लिए इस क्षेत्र के समुद्री मार्गों को निरापद रखना चाहता है, वहीं भारत को भी वह यहीं तक सीमित करना चाहता है। इसके लिए उसने म्यांमार, श्रीलंका व पाकिस्तान में बंदरगाह विकसित किए हैं। अपनी पूर्वी सीमा के पड़ोसियों दक्षिण कोरिया, जापान, वियतनाम वगैरह से भी समुद्री सत्ता के लिए उसके झगड़े चलते रहते हैं। चीन की नजर सिर्फ समुद्री मार्गों पर नहीं, बल्कि समुद्र की भूगर्भीय संपदा पर भी है। समूची रणनीति में चीन के मित्र पाकिस्तान व उत्तरी कोरिया जैसे देश हैं, जिनमें लोकतंत्र ने जड़ें नहीं पकड़ी हैं। पाकिस्तान का इस्तेमाल अमेरिकियों ने भी अपने हित के लिए किया है, पर हो सकता है कि अमेरिका की दूरगामी नीति में पाकिस्तान बहुत उपयोगी न साबित हो। अमेरिका को लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं वाले मजबूत देश चाहिए होंगे, जो अपने पैरों पर खड़े हों और अमेरिकी सहायता पर निर्भर न हों। ऐसे में भारत के लिए भी जरूरी है कि वह ऐसी रणनीति बनाए, जो किसी के खिलाफ न हो, लेकिन उसके अपने और विश्वशांति के हित में हो। यह बैठक इस नजरिये से महत्वपूर्ण हो सकती है।

 

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  • Web Title:भविष्य की रणनीति