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इतिहास का हिस्सा

वर्ष 1791 में क्रिसमस से तीन हफ्ते पहले द ऑब्जर्वर की पहली टीम इसके पहले अंक के आने का इंतजार कर रही थी। क्या उन्होंने यह कल्पना की थी कि 220 साल बाद भी यह प्रकाशित होता रहेगा? आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उन लोगों के जवाब न में ही होंगे। वैसे भी न्यूजरूम में भविष्य के मायने महज अगले हफ्ते के पन्नों तक ही सीमित होते हैं। खैर, द ऑब्जर्वर की पहली संपादकीय टीम ने उस अखबार को एक-दो वजहों से आज भी प्रासंगिक बना रखा है। दरअसल, 1791 में पूरे यूरोप में ‘अभूतपूर्व संकट’ था। उस वक्त फ्रांस के राजा लुई-16 व रानी मेरी अनतोईनेत्ते अपने घर में नजरबंद थे। उधर, ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विलियम पिट कर उगाही के जरिये सरकारी खजाने को भरने पर जोर दे रहे थे। दरअसल, अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटेन पर कर्ज बढ़ गया था। उस दौर में सेलिब्रिटी भी काफी सुर्खियों में रहे। मोजार्ट की मैजिक फ्ल्यूट के प्रोग्राम का प्रीमियर होने में कुछ महीने बचे थे और वह वियेना में मृत्युशय्या पर पड़े थे। उस वक्त की कई किताबों में द ऑब्जर्वर के पहले अंक की चर्चाएं हैं। उन्हीं में एक किताब है- राइट्स ऑफ मैन। इसके लेखक हैं थॉमस पैन। इस किताब में लिखा गया है कि कैसे ऑब्जर्वर के उस पहले अंक में गुलामों की आजादी के समर्थन में कई लेख हैं। अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम व रंगभेद नीति पर अखबार के नजरिये को इस किताब ने सराहा है। उस साल पर आधारित एक और किताब आई थी, बोसवेल की लाइफ ऑफ सैमुअल जॉनसन। इस किताब ने उस वक्त के द ऑब्जर्वर को जीने की कोशिश की है। किताब ने इसे ज्वलंत मुद्दों को उठाने व जीवंत विषयों को सर्वश्रेष्ठ नजरिये से प्रस्तुत करने वाला बताया है। यही नहीं, द ऑब्जर्वर के खबरनवीसों की ‘प्रतिबद्ध पत्रकारिता’ को ‘ऑरिजनल इनसाइड स्टोरी’ की मान्यता दी गई। अखबार के शब्द तब तक जीवित रहते हैं, जब तक कि पाठक उसे अपनी आंखों व अपने दिमाग में कैद रखता है। इस मायने में ऑब्जर्वर के पहले अंक ने भविष्य को भांप लिया था। तभी तो, 220 वर्ष बाद भी हम जश्न मनाते हैं कि हमने अकेले ही इसे इतना बेहतर नहीं बनाया है।
द ऑब्जर्वर, लंदन

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