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अशिक्षित महिला फैला रही है शिक्षा का उजाला

खुद अशिक्षित होने के बावजूद उत्तर प्रदेश की एक महिला बीते 25 सालों से गरीब बच्चों को अशिक्षा के अंधकार से ज्ञान के उजाले की तरफ ले जा रही है।

मुजफ्फरनगर जिले के गढ़ी दौलतपुर गांव की निवासी 60 वर्षीया कैला देवी अपने शिक्षक पति की मौत के बाद गरीब बच्चों के जीवन में शिक्षा का उजाला फैलाने के उनके सपने को साकार करने में जुट गईं, जो आज भी जारी है।

कैला देवी ने आईएएनएस से कहा, ''अपने पति की असमय मृत्यु के बाद मैंने शिक्षा का उजाला फैलाने के उनके समर्पण को उसी तरह आगे बढ़ाने का निश्चय किया, जैसा वह शायद अपने जीवन काल में करते।''

उन्होंने कहा, ''मैं घर-घर जाकर लोगों को शिक्षा के महत्व के बारे में जागरूक करके उन्हें अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती थी। मैं लोगों को समझाती कि शिक्षित होने से आपका बेटा या बेटी जीवन की लगभग हर छोटी बड़ी कठिनाई का आसानी से सामना कर सकेगा।''

कैला याद करते हुए कहती हैं कि बच्चों को स्कूल भेजने को लेकर ग्रामीणों की उदासीनता को देखते हुए उन्होंने उन्हें अपने घर में पढ़ाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने कुछ ग्रामीणों को किसी तरह राजी कर लिया कि वे हर रोज अपने बच्चों को पढ़ने के लिए उनके घर भेज दें।

उन्होंने बताया, ''बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी मैंने बड़े बेटे सत्यपाल सिंह को सौंपी, जो उस समय कक्षा-8 में पढ़ता था। वह स्कूल से लौटने के बाद शाम को घर में बच्चों को पढ़ाता था। उसके आने के पहले मैं बच्चों को रामायण और महाभारत से जुड़ी कहानियां सुनाकर नैतिक शिक्षा के बारे में बताती थी।''

कैला के मुताबिक कुछ साल बाद सत्यपाल का चयन उत्तर प्रदेश पुलिस में होने के बाद शिक्षा के प्रति गांव के लोगों का लगाव बढ़ा और धीरे-धीरे ग्रामीण अपने बच्चों का स्कूल में दाखिला करवाने में दिलचस्पी लेने लगे।

वर्तमान में पुलिस उपाधीक्षक पद पर तैनात सत्यपाल जब नौकरी करने के लिए घर से दूर चले गए तो बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी पशु चिकित्सक के पद पर कार्यरत कैला देवी के छोटे बेटे हरपाल सिंह संभालने लगे।

हरपाल कहते हैं, ''मैं रोज शाम दो घंटे का समय गरीब बच्चों के लिए निकालता हूं। वर्तमान में गरीब परिवारों के करीब 30 बच्चों हैं जिनको हम पढ़ाते हैं। इस काम में मैं कुछ पूर्व छात्रों की मदद लेता हूं, जिनको कभी हम लोगों ने पढ़ाया था।''

कैला देवी से जुड़े रहे कई बच्चों आज विभिन्न सरकारी पदों पर कार्यरत हैं।

हरपाल कहते हैं, ''मुझे खुशी होती है कि अपनी व्यस्त दिनचर्या से शिक्षा का उजाला फैलाने की अपनी मां के मुहिम में मैं कुछ सहयोग कर पाता हूं। मुझे लगता है कि इससे मेरे पिता की आत्मा को बहुत शांति मिलती होगी।''

वह कहते हैं कि उनकी मां आज भी 60 वर्ष की अवस्था होने के बावजूद अक्सर पड़ाेस और बस्तियों में जाकर वहां रहने वाले लोगों से अपने बच्चों को स्कूल भेजने की अपील करती हैं।

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