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विरोध पर उद्योग खफा

रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर हो रहे विरोध को उद्योग जगत की हस्तियों ने महज राजनीतिक ड्रामा करार दिया है। प्रमुख उद्यमियों का कहना है कि संसद में इस मुद्दे पर बना गतिरोध गंभीर चिंता का विषय है। क्योंकि, संसद ठप रहने के कारण इस मसले से भी ज्यादा महत्वपूर्ण विधेयक लंबित पड़े हैं। उन्होंने लोगों से इस सियासी विरोध के खिलाफ खड़ा होने की अपील की है।

एचडीएफसी के चेयरमैन दीपक पारेख और यूनीलीवर के पूर्व प्रमुख अशोक गांगुली ने रविवार को  कहा है कि देश में अर्थव्यवस्था की गति धीमी होने का संकट संसद में गतिरोध से उत्पन्न संकट के आगे कुछ भी नहीं है। संसद जैसी पवित्र संस्थाएं, जिन उद्देश्यों को लेकर स्थापित की गई थीं, उस लिहाज से वे काम करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पा रही हैं।

उन्होंने कहा, ‘लोकतंत्र में खुलेपन को प्रोत्साहित किया जाता है और लोगों को विरोध दर्ज कराने का अधिकार दिया जाता है। मगर निरंतर व्यवधान और बिखराव संसद जैसी संस्था की पवित्रता नष्ट करने के समान है। रिटेल में विदेशी निवेश पर विरोध कुछ निहित स्वार्थों के पक्ष मे हैं, जबकि एफडीआई को मंजूरी व्यापक रूप में यह जनता के हितों के पक्ष में है। संगठित खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश को लेकर दिखाई जा रही चिंता नाटक है। किसानों, उपभोक्ताओं व आम लोगों को निश्चित रूप से इसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए।’

पारेख व गांगुली ने उद्योग जगत में अच्छी सोच रखने वालों से देश की आर्थिक नीतियों में सुधार के लिए उठाए जाने वाले हर कदम का साथ देने की अपील की है। पारेख इससे पहले विप्रो के प्रमुख अजीम प्रेमजी के साथ मिलकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर सरकार की नीति निर्णय क्षमता पर सवाल उठा चुके हैं। उस वक्त उनका इशारा टूजी व राष्ट्रमंडल घोटालों में उलङी सरकार द्वारा कोई ठोस निर्णय न कर पाने की ओर था।

उल्लेखनीय है कि विपक्ष के साथ-साथ द्रमुक व तृणमूल कांग्रेस भी खुदरा क्षेत्र में एफडीआई का विरोध कर रही है। इस फैसले के बाद से संसद में कामकाज नहीं हो पाया है।

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने शनिवार को कहा था कि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने आश्वासन दिया है कि गठबंधन सरकार में सहमति बनने तक खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के फैसले को टाल दिया गया है।

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