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सदाबहार देव

देव आनंद नहीं रहे। लेकिन पिछले छह दशकों में वे अपने पीछे इतना कुछ छोड़ गए हैं, जो आने वाले समय में एक धरोहर साबित होंगे। चिर युवा देव आनंद ने अपनी जिंदगी में तमाम उतार-चढ़ाव देखे, पर ना कभी चढ़ाव से अति उत्साहित हुए और ना ही उतार से घबराए। फिल्मों के प्रति उनकी चाहत, उनका पैशन आखिरी सांस तक जिंदा रहा। जिंदादिल देव को सलाम!

टेलीफोन पर अब वह जिंदादिल आवाज कभी सुनाई नहीं पड़ेगी-हैलो...। देव आनंद की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह फोन खुद रिसीव करते थे और सामने वाले से बात करते थे। हैलो कहने का उनका अपना अंदाज था। उनसे मेरी पहली मुलाकात वर्ष 2001 में उनके पुत्र सुनील आनंद ने कराई थी। तब सुनील की फिल्म मास्टर रिलीज होने वाली थी।

सुनील से बात करने के बाद मैं देव साहब से मिला और उनसे बात करने के बाद मुझे अहसास हुआ कि यह शख्स अब तक जवां क्यों है। मुझे पता नहीं कि वह गीता में कृष्ण के बताए उपदेश को मानते थे या नहीं। मगर उनकी पूरी जिंदगी में यह देखने को मिला कि कर्म किए जा और फल की इच्छा मत कर। वह सचमुच काम के पुजारी थे और हमेशा काम के बारे में ही सोचते रहते थे। वे  सकारात्मक ऊर्जा से कूट-कूट कर भरे थे और नकारात्मक सोच को अपने आसपास फटकने भी नहीं देते थे।

वह अपनी दिनचर्या अखबारों के साथ शुरू करते थे। दुनियाभर की खबरों पर बारीक नजर रखते थे और अपनी फिल्मों का विषय भी वहीं से तलाशते थे। 
उनसे कई बार मैंने यह सवाल पूछा कि फिल्म की असफलता के बाद भी तुरंत दूसरी फिल्म कैसे बनाते हैं? फाइनेंसर कहां से आते हैं? वह किसी भी सवाल का जवाब टालते नहीं थे। लेकिन जब वह समझते थे कि उसका जवाब देना है तो वह बिंदास जवाब देते थे।

उन्होंने कहा था कि उन्हें अपने काम से प्यार है और वह दिमाग से सोचते हैं। वह एक काम पूरा करते थे और फिर नए काम में खुद को व्यस्त कर लेते थे। उन्होंने यह भी कहा था कि जिस दिन दिमाग थक जाएगा, काम करना बंद कर देगा तो उस दिन सांसें रुक जाएंगी और देव आनंद नहीं रहेगा।

काम के प्रति लगाव की वजह से ही वह फ्लाप फिल्में देने के बावजूद नई फिल्म बनाने में जुट जाते थे। उनकी आखिरी फिल्म चाजर्शीट थी, जिसके रिलीज के बाद उन्होंने एक और फिल्म बनाने के लिए कहानी तैयार कर ली थी। देव आनंद ने हमेशा खुद को युवा माना। इसलिए उन्होंने हमेशा अपनी फिल्मों में नए चेहरों को मौका दिया। हालांकि, खुद उनमें एक सामान्य युवा से ज्यादा ऊर्जा थी।

उनकी आधी से ज्यादा जिंदगी स्टूडियो में ही गुजरी। वह सुबह 11 बजे के बाद स्टूडियो में आते थे और देर रात तक स्टूडियो में रहते थे। जब उनकी फिल्म की शूटिंग पूरी हो जाती थी, तो वह दो-तीन दिनों तक स्टूडियो से बाहर भी नहीं आते थे। वह अपनी फिल्मों का विषय चुनते समय इस बात का पूरा ख्याल रखते थे कि भटके हुए युवाओं को सही दिशा मिले।

उनका मानना था कि जिस समाज और देश के युवा सही सोच के साथ सही रास्ते पर चलने वाले हैं, वहां तरक्की देखने को मिलेगी। मैंने उनसे एक बार पूछा था कि उन्होंने आपातकाल के दौरान अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई थी, उससे आज के युवाओं को क्यों नहीं जोड़ते हैं? इस पर उनका जवाब था कि उन्होंने राजनीति से तौबा कर ली है और वह फिर से अपनी पार्टी को जीवित नहीं करेंगे। लेकिन फिल्मों के जरिए वह युवाओं को प्रेरित करने का काम करते रहेंगे।
नवीन कुमार

देव आनंद
26 सितम्बर 1923-04 दिसम्बर 2011
असली नाम: धर्मदेव आनंद
पिता का नाम: पिशोरी लाल आनंद
जन्म: शंकरगढ़ तहसील, नारोवाल जिला, पाकिस्तान
शिक्षा: अंग्रेजी साहित्य में स्नातक, लाहौर
परिवार: कल्पना कार्तिक (पत्नी), चेतन आनंद और विजय आनंद (भाई), भांजा (निर्देशक शेखर कपूर)
सिनेमा में सक्रिय कार्यकाल: 1946-2011, इस दौरान उन्होंने 19 फिल्में निर्देशित कीं, नवकेतन बैनर तले 31 फिल्मों का निर्माण किया, उन्होंने अपनी 13 फिल्मों की कहानियां भी लिखीं।

फिल्म फेयर
बेस्ट एक्टर- मुनीम जी (1955), कालापानी (1958)
बेस्ट फिल्म- गाइड (1966)
लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड (1991)
राष्ट्रीय पुरस्कार
पद्म भूषण (2001)
दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (2002)
बम्बई पहुंचे: 1940 के दशक की शुरुआत में चर्चगेट में मिलिट्री सेंसर ऑफिस में 165 रुपये के वेतन पर नौकरी शुरू की और बड़े भाई चेतन आनंद के साथ इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन से जुड़े।


देव के सदाबहार गीत
तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं (फिल्म गाईड)
क्या से क्या हो गया तेरे प्यार में (फिल्म गाईड)
पल भर के लिए कोई हमे प्यार कर ले (फिल्म जॉनी मेरा नाम)
मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया (फिल्म हम दोनों)
आसमां के नीचे हम आज अपने पीछे (फिल्म ज्वैल थीफ)
चूड़ी नहीं ये मेरा दिल है देखो देखो टूटे ना (फिल्म गैम्बलर)
दिल आज शायर है गम आज नगमा है (फिल्म गैम्बलर)
गाता रहे मेरा दिल तू ही मेरी मंजिल (फिल्म गाइड)
फूलों के रंग से (फिल्म प्रेम पुजारी)
ये दिल ना होता बेचारा (फिल्म ज्वैल थीफ)
फूलों का तारों का सबका कहना है (हरे रामा हरे कृष्णा)
(फेसबुक और विभिन्न ब्लॉग्स पर देव साहब के कुछ चर्चित गीत, जिन्हें लोग बार-बार सुनना पसंद करते हैं)

उन दिनों मेरी फिल्म कयामत से कयामत रिलीज हुई थी और उसे बड़ी सफलता मिली थी। मेरे पास फिल्मों के ऑफर आने लगे थे। एक दिन मेरे अब्बा जान ने फोन करके मुझसे कहा कि देव साहब का फोन आया था और वह अपनी फिल्म में तुम्हें लेना चाहते हैं। मैंने देव साहब को हां कर दिया है और तुम उन्हें फोन कर लो।

मैंने अब्बू से कहा कि मैंने पटकथा पढ़ी नहीं है। इस पर मेरे अब्बू ने कहा कि देव साहब की फिल्म के लिए पटकथा पढ़ने की जरूरत नहीं है। और मैंने बिना पटकथा पढ़े ही उनकी फिल्म साइन कर ली थी।

देव साहब एक आईकोनिक क्रिएटिव इंसान थे। वह हमसे उम्र में बड़े थे, लेकिन वह हमसे एक कदम आगे रहते थे। उनमें गजब की ऊर्जा थी।
आमिर खान (अभिनेता)

ट्विटर पर कमेंट्स
देव आनंद के निधन की खबर सुनकर बहुत दुख हुआ है। एक और महान अभिनेता मंच से चला गया। उनके परिवार के प्रति मेरी संवेदनाएं। वह हमेशा याद आएंगे।
माधुरी दीक्षित, अभिनेत्री

एक बार देव साहब से पूछा था कि वह इतनी जल्दी-जल्दी क्यों बोलते थे। जवाब में उन्होंने कहा, ‘जिंदगी बहुत छोटी है अनुपम। मेरे पास धीरे-धीरे बात करने का समय नहीं है।’
अनुपम खेर, अभिनेता

देव साहब अपनी शर्तों पर जिंदगी जीते थे। वह आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में उन्हें हमेशा जिंदा रखेंगी। मैं उनके हौसले को सलाम
करती हूं।
शबाना आजमी, अभिनेत्री

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