DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

देव साहब पूरी कर गए अपनी कहानी

‘तो कहां से शुरू किया जाए?’ सवाल मुझे करना था, पर किया उन्होंने। वह भी शुद्ध हिंदी में। भूरे रंग की कार्डराय जींस और हलके पीले रंग की शर्ट। गले में चेक वाली मफलर। हाथ में भारी घड़ी। बाल पूरे काले और सधे हुए। आवाज में जोश, नजरों में हलकी चुलबुलाहट। उनका यह कहना कि मैं जब भी किसी नए व्यक्ति से मिलता हूं, उतना ही उत्तेजित होता हूं, जितना आज से पचास साल पहले हुआ करता था, दिल के हर कोने को झंकृत कर गया।

उस समय देव साहब पचहत्तर के आस-पास थे। उनसे मिलना अपने आप में एक नितांत अविस्मरणीय अनुभव था। हर बार। पहली बार मिलने से पहले दिल बुरी तरह धड़क रहा था। मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, दिल का भंवर करे पुकार., अभी ना जाओ छोड़ कर.., दिल ढल जाए हाय रात ना जाए... जैसे न जाने कितने सदाबहार गानों को जीवंत करने वाला हर दिल अजीज जोशीला नायक।

जिसके चेहरे-मोहरे और कद-काठी को देखकर पचास के दशक की लगभग हर स्त्री अपने जीवन साथी में उस कद्दावर इंसान की एक झलक पाना चाहती थीं। अम्मां के मुख से हमेशा सुनती आई थी कि उस दौर में किस तरह चेन्नई के एकमात्र थियेटर में जहां हिंदी फिल्में लगा करती थीं, देव आनंद की फिल्में हाउसफुल चलती थीं। अम्मां ने अपनी जिंदगी में देव साहब की हर फिल्म देखी थीं। देव आनंद के नाम से ही उत्तेजित होने वाली उस पीढ़ी के बाद हमारी पीढ़ी ने कभी उन्हें गाइड के राजू के किरदार में रोजी को पनाह देते और उसकी बेवफाई से टूटते-हारते एक युवक के रूप में देखा, तो कभी हरे रामा हरे कृष्णा में अपनी भूली-बिसरी बहन से मिलने का जज्बा लिए एक भाई के रूप में जीवंत अभिनय करते।

जिन दिनों मुझे उनसे पहली बार मिलने का मौका मिला, देव आनंद हम नौजवान बना चुके थे। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने खास कमाल नहीं दिखाया था। लेकिन उनका हौसला पस्त नहीं हुआ था। पूरे जोश से कहा था, ‘अभी तो मैं शुरू हुआ हूं, इतनी जल्दी खत्म कैसे हो जाऊंगा?’ वह आमिर खान के साथ अव्वल नंबर बनाने जा रहे थे। क्रिकेट की पृष्ठभूमि पर बन रही इस फिल्म का जिक्र करते हुए उन्होंने जानना चाहा था कि आजकल युवाओं को किस तरह की फिल्में पसंद आती हैं?

अपनी जिंदगी के हर लम्हे को कैसे भरपूर जिया जाता है, यह सिर्फ देव आनंद ही बता सकते थे। तो क्या हुआ, जो देस-परदेस के बाद उनकी कोई भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कामयाब नहीं रही? तो क्या हुआ, जो देव साहब ने दूसरे उम्रदराज अभिनेताओं की तरह अपने आपको चरित्र भूमिकाओं के हवाले न किया। देव साहब को कभी किसी से शिकायत नहीं रही। और न फिल्म के चलने या न चलने का डर।

उनसे कुछ मुलाकातों के बाद ही यह अहसास हो गया कि हमेशा अप-टु-डेट रहने वाला यह सदाबहार नायक अंदर से बहुत भावुक और मानवीय है। आपके सामने विदेशी चॉकलेट और बिस्किट पेश करने वाला यह मेजबान खुद अदरक-इलायची वाली मसाला चाय और गुड़ का बना गजक खाना पसंद करता है।

अपने साक्षात्कारों में वह खुलकर अपने संघर्ष के दिनों के किस्से सुनाते थे। किस तरह वह मुंबई की चाल में रहे, एक कमरे में दस लोग, एक साथ चादर और बाथरूम में घुसने को तत्पर। खाने को पैसे नहीं होते थे, पर मन ऐसा कि हर वक्त हिलोरे लेने को तैयार रहता था। देव साहब की आंखें उन दिनों को याद कर अकसर पनीली हो उठतीं। वह कहते थे, ‘मुझे हमेशा अच्छे लोग मिले, जिन्होंने मुझे आगे बढ़ाया। अशोक कुमार न मिले होते, तो जिद्दी जैसी फिल्म न मिलती और मैं शायद एक कामयाब हीरो कभी न बन पाता। गुरु दत्त न मिले होते, तो कभी मेरी प्रतिभा सामने न आती। राज कपूर न होते, तो मेरे काम में इतना निखार न आता। मैं बहुत शिद्दत से इन सभी को मिस करता हूं। इसलिए मेरी हमेशा कोशिश रहती है कि मैं नई प्रतिभाओं को मौका दूं। जिस तरह वर्षों पहले एक देव आनंद को अपने पैरों के नीचे जमीं मिली, उसी तरह हो सकता है, मेरी वजह से किसी नौजवां को अपनी जिंदगी में मकसद मिल जाए।’

देव आनंद ऐसे इनसान थे, जिनके अंदर मोहब्बत कूट-कूटकर भरा था। वह अपने आपको एक सदाबहार अभिनेता की बजाय, ‘इटरनल रोमांटिक’ कहते थे। पर राख की ढेर के नीचे बहुत कुछ था, जो वह बस बुदबुदा कर रह जाते। वर्षों बाद भी सुरैया के नाम से उनके चेहरे पर चमक आ जाती। उनके मुंह से बस मैंने इतना ही सुना, ‘मोहब्बत करने का अहसास है, पाने का नहीं।’ सुरैया के बाद भी उनकी जिंदगी में कई बार मोहब्बत ने दस्तक दी। कल्पना कार्तिक से शादी हुई, पर मन नहीं मिले।

देव आनंद को इस उम्र में अकेले रहने से भी कभी शिकायत नहीं रही। वह कहते, ‘तन्हाई मेरी सबसे अजीज दोस्त है। अब लगता है, मैं अपनी जिंदगी किसी के साथ बांट नहीं पाऊंगा। जब अकेला रहता हूं, तो हर वक्त दिमाग में यही खयाल आता है कि बहुत कुछ करना है, नई कहानी, पटकथा, फिल्म, मैं कोशिश करता हूं कि रोज दफ्तर जाऊं, नए लोगों से मिलूं। नए लोगों से बातचीत कर मैं चार्ज हो जाता हूं। मुझे अंदर से ताकत मिलती है। खासकर युवाओं से। वह मेरी फिल्मों को लेकर मुझसे बहस करते हैं, उलझते हैं। मुझे अच्छा लगता है। मैं सीख रहा हूं, नई पीढ़ी की तरह से जीना। मेरे मन में कभी यह बात नहीं आती कि मैं बूढ़ा हो गया हूं और अब मुझे काम से रिटायर हो जाना चाहिए। मैं ऐसा कभी नहीं कर सकता। मुझे मरने से डर नहीं, पर हां, काम ना करने का डर है।’

हर वक्त वह नई योजनाओं के बारे में बात करते, जो भी मिलता उनसे। पत्रकारों से कुछ ज्यादा। वह पता करते कि इन दिनों कौन-सी फिल्म चल रही है, उसकी कहानी पूछते, यह भी जानना चाहते कि निर्देशन कैसा था, तकनीक कैसी थी? और जब आप उनसे विदा लेने की अनुमति चाहते, वह फौरन उठकर लिफ्ट तक आपको छोड़ने आते। गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए यह जानना चाहते कि आप अगली बार उनसे मिलने कब आ रहे हैं? सुना था कि पिछले कुछ दिनों से वह अपने अतिथियों को लिफ्ट तक छोड़ने नहीं जा पा रहे। पर वह इसके लिए माफी जरूर मांग लेते। कहते कि अगली बार जब पैर का दर्द ठीक हो जाएगा, तो वह जरूर आएंगे, नीचे तक।

देव आनंद ही ऐसा कर सकते थे। परफैक्ट जैंटिलमैन। उन्हें किसी की मौत पर आंसू बहाना पसंद नहीं था, अपनी पर भी नहीं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:देव साहब पूरी कर गए अपनी कहानी