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बहुत कुछ सीखने को है पूर्वोत्तर भारत से

अलगाववादी ग्रुपों के कारण समय-समय पर सुर्खियों में रहने वाला उत्तर-पूर्व भारत, देश के अन्य हिस्सों के लिए हमेशा से रहस्य और उत्सुकता का विषय ही रहा है। अपने नाक-नक्श के चलते उत्तर-पूर्व भारत के मूल निवासी, आर्य और द्रविड़ सभ्यताओं की थाती सहेजे मुख्य भारत के निवासियों से अलग नजर आते हैं। सिर्फ नाक-नक्श ही नहीं, खान-पान और रीति रिवाजों मे भी बहुत कुछ ऐसा है, जो देश की मूल धारा से साम्य नहीं रखता है। धार्मिक क्षेत्र में भी जहां नगालैंड, मिजोरम, मेघालय में ईसाइयत का बोलबाला है, वही सिक्किम और अरुणाचल के कुछ हिस्से बौद्ध धर्म से प्रभावित हैं, तो अन्य बहुत से क्षेत्रों में स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा वहां के नागरिक करते हैं।

इन विभिन्नताओं ने उत्तर-पूर्व भारत को भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य में एक अलग और विशिष्ट स्थान दे दिया है। वहां के सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन के सकारात्मक पक्षों को जानने, समझने और उनसे सीखने की कोशिश आम तौर पर कम ही हुई है। न उनका बहुत ज्यादा जिक्र होता है और न ही ज्यादा लिखा-पढ़ा ही जाता है।

विभिन्न जनजातियों में बंटे उत्तर-पूर्व की एक विशिष्टता है, वहां का सामुदायिक जीवन। आज भी वहां की विभिन्न जनजातियों मे सामूहिकता और सामुदायिकता के संस्कारों के चलते एक-दूसरे के प्रति सम्मान और आदर की भावना हर कहीं देखने को मिल जाएगी। सामुदायिक भावना ने इन समाजों मे पैदा हो रही आर्थिक विषमता के बावजूद, अभी तक समाज को छिन्न-भिन्न होने से बचाए रखा है।

मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड मे ‘कम्युनिटी सोशल वर्क’ का प्रचलन इतना जबर्दस्त है कि अपने मुहल्लों और इलाकों में समय-समय पर किए गए 'सोशल वर्क’ के चलते उन इलाकों की साफ-सफाई और पर्यावरण संरक्षण एक मिसाल बन गए हैं। उत्तर-पूर्व भारत के निवासियों के लिए यह कोई आश्चर्य की बात नही है कि देश का सबसे स्वच्छ गांव शिलांग के करीब स्थित मावलीनौंग हैं।

उत्तर-पूर्व से सीखने के लिए एक अन्य चीज है, जीवन को उल्लासपूर्ण तरीके से जीने का रिवाज। किसी भी जन-जाति के त्योहार की कल्पना बिना सामूहिक भोज और सामुदायिक नृत्य के हो ही नहीं सकती। इन नृत्यों में जन-जाति के सभी सदस्य (चाहे वह किसी भी उम्र के हों) बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। महिलाओं और पुरुषों के मध्य किसी भी तरह का लिंगभेद नही किया जाता है।

महिलाओं को जो सम्मान और सुरक्षा उत्तर-पूर्व भारत में प्राप्त है, वह देश के किसी के अन्य हिस्से में नहीं। क्या यह उचित वक्त नहीं है कि सामंतवादी और व्यक्तिवादी अतिवाद से प्रभावित देश का बड़ा भू-भाग अपने निवासियों का जीवन खुशहाल और उल्लास पूर्ण बनाने के लिये एक बार पूर्वोत्तर की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं पर भी विचार करें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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