DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

चपत से चांटे तक का सफर

किसी के गाल पर हाथ का जबरन झन्नाटेदार प्रयोग थप्पड़ कहलाता है। यह नपुसंक आक्रोश का द्योतक है। हिंसा का परिचायक है। आत्म-नियंत्रण के अभाव का प्रतीक है। थप्पड़ के कई पर्याय हैं, जैसे लप्पड़, झापड़, चांटा, तमाचा, वगैरह-वगैरह। इन सब में अधिक अपनी निजी पसंद चपत है।

कल ही हमने देखा है। एक प्रेम-पगे युवक-युवती के जोड़े को आपस में गाल को हल्के-हल्के, प्यार से चपतियाते हुए। हमें खुशी हुई, उन से रश्क भी। हमारे जमाने में ऐसी हरकतें छिप-छिप कर होती थीं। आलम यह था कि मियां-बीबी तक एक-दूसरे के हाथ में हाथ डालने से झिझकते थे।

कुछ जानकारों का कहना है कि आचरण और अंतर की सुप्त भावनाओं की खुली और सार्वजनिक अभिव्यक्ति का रिश्ता नारी-पुरुष की बढ़ती बराबरी से है। कुछ समझदार मानते हैं कि सब पश्चिमी देशों के नैतिक दुष्प्रभाव का आयातित आयाम है, जो लिव इन डाइवोर्स, उन्मुक्त व्यवहार जैसी प्रवृत्तियों में झलक रहा है। हमारी हसरत है कि अपने जन्म की दुर्घटना कुछ वर्षों बाद क्यों न हुई!

हम ने पाया है कि चपत के कोमल अंतरंग भावनाओं के आदान-प्रदान में व्यक्त संबंध जब विवाह में बदलते हैं, तो कभी-कभार चांटों में भी तब्दील होते हैं। सार्वजनिक जीवन में तो अकसर ऐसा होता है। कोई भरोसा नहीं कि कब जनता जयकार करे, कब उन्हीं जननायकों से जूतम-पैजार। ऐसे भी वर्तमान के हिंसा-बहुल समाज में घर, दफ्तर, बाजार, पार्क, सड़क, प्रेक्षागृह कहीं भी पिटने की वारदात संभावित है। ऐसे हादसों की भविष्यवाणी न खुफिया एजेंसियां कर पाती हैं, न ज्योतिषी।

एक आशंका रहित मंत्री, मुदित मन, साहित्यिक समारोह में सम्मान समर्पित कर अंदर से बाहर पधारे और यकायक थप्पड़ का शिकार हो गये। गांधी के देश में ऐसी नागवार हरकत की निंदा होनी ही होनी। हमें लगता है कि तमाचा किसी व्यक्ति विशेष के न होकर व्यवस्था के गाल पर है। व्यापक भ्रष्टाचार, महंगाई और उसके प्रति सरकारी संवेदनहीनता और निर्णय-शून्यता के विरुद्ध विरोध की आवाज है। कौन जाने, कल क्या शक्ल ले? एकल थप्पड़ का स्वर सामूहिक बना, तो प्रजातंत्र के भविष्य के लिए खतरा है।
गोपाल चतुर्वेदी

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:चपत से चांटे तक का सफर