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बीबीसी पर पाबंदी

सूचना के स्नोतों पर पाबंदी लगाने की प्रवृत्ति हमारे मुल्क में बढ़ती जा रही है। हाल ही में तमाम तरह के वेबसाइटों पर पाबंदी लगा दी गई थी। उस वक्त ‘मुल्क की सुरक्षा’ व ‘नैतिकता’ का हवाला दिया गया। अब इस प्रवृत्ति को नए स्तर पर ले जाया जा रहा है।

पाकिस्तान केबल ऑपरेटर संघ ने देश में बीबीसी के प्रसारण पर रोक लगा दी है, ताकि उस ड्रॉक्यूमेंटरी को न दिखाया जा सके, जो आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान की संदिग्ध भूमिका पर है। हालांकि नाटो की कार्रवाई के बाद इस तरह के आरोप गंभीर हैं। इसे समझा जा सकता है। पर कुछ जरूरी सवाल हैं। क्या केबल ऑपरेटरों को इस तरह के फैसले लेने का हक है?

बीबीसी के प्रसारण अधिकार को रद्द करने के लिए ऑपरेटरों ने पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नियामक प्राधिकरण पर जोर डाला था। ऐसा करके पाकिस्तान को बाहरी दुनिया से अलग-थलग किया जा रहा है। सवालों में घिरी डॉक्यूमेंटरी को इंग्लैंड में अक्टूबर व नवंबर महीने में प्रसारित किया गया। इसे यू-ट्यूब पर भी डाला गया है। अब तक डॉक्यूमेंटरी के भाग एक को 36,793 बार व भाग दो को 25,353 बार देखा जा चुका है।

वैसे भी, सेटेलाइट डिश कनेक्शन रखने वालों के लिए बीबीसी उपलब्ध है। पाकिस्तान में ऐसे गिने हुए लोग ही हैं, जिन्होंने इस डॉक्यूमेंटरी को देखा होगा। आधिकारिक तौर पर किसी ने इसकी शिकायत संबंधित प्राधिकरण से नहीं की है। केबल ऑपरेटरों ने भी इसकी शिकायत नहीं की है। ऐसे में यह आश्चर्य की बात है, किसके इशारे पर पाबंदी लगाई गई। बेशक, हमें किसी टीवी चैनल के तथ्यों से असहमत होने का अधिकार है। वैसे, डॉक्यूमेंटरी की आलोचना हो चुकी है। उसकी रिपोर्टिंग पर काफी कुछ कहा-सुना गया है। पर लोगों को अपने पसंद का कार्यक्रम देखने का हक है।

इसमें दो राय नहीं कि बीबीसी जैसे टीवी चैनल हमारे खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे हैं। लेकिन लोगों को विचार जानने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। समस्या से निपटने का यह नासमझ तरीका अपनाया गया है। केवल सूचनाओं के अभूतपूर्व प्रवाह के जरिये ही इस युग में गलत खबरों से लड़ना मुमकिन है।
द न्यूज, पाकिस्तान

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