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संसद में हंगामा

एक बार फिर संसद का सत्र ठीक से नहीं चल रहा है। अधिकतर दिनों की कार्यवाही हंगामें की भेंट चढ़ गई है। जनता के सामने नेताओं की छवि उद्दंड छात्रों-सी बन रही है, जो कालेजों में पढ़ाई के नाम पर सिर्फ और सिर्फ हो-हल्ला करते हैं। क्या माननीय सांसद यह भी भूल गए है कि टीवी पर संसदीय कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है। जाहिर है, जनता सर पीट रही है कि हमने ऐसे नेताओं को चुनकर संसद में क्यों भेजा? एक वक्त था, जब भूपेश गुप्त, मधु लिमये, राम मनोहर लोहिया के संसदीय भाषण को लोग रेडियो पर सुनते थे। लेकिन आज लालकृष्ण आडवाणी और प्रणब मुखर्जी जैसे वरिष्ठ नेताओं के रहते हुए संसद की कार्यवाही स्थगित है। शायद जन प्रतिनिधि जनता के आक्रोश को भूल गए हैं। इस बार उन्हें जनता की ताकत का अहसास दिलाना ही होगा।
स. एस. बीकानेरी, सरस्वती विहार, नई दिल्ली

बार-बार अपराध क्यों
कोई अपराधी बार-बार जुर्म क्यों करता है? यह एक यक्ष प्रश्न है, सरकार व न्यायविदों के सामने। आखिर हम या हमारी न्यायिक व्यवस्था से कहां चूक हो जाती है कि अपराधी जुर्म करने के बाद भी छूट जाता है। देखा जाए, तो देश में ऐसे कई अपराधी खुले-आम घूम रहे हैं, जिन्होंने कई घिनौने काम किए हैं। अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो देश को अपराध-मुक्त करने का हमारा संकल्प मात्र निर्थक विचार बन कर रह जाएगा? शायद, कोर्ट में लंबित मामलों से भी इस पर असर पड़ता है, क्योंकि साल-दर-साल सुनवाई चलती रहती है और अपराधी तब तक गवाहों को खरीद लेते हैं। वैसे, हमारे यहां कानून तो सख्त हैं, लेकिन उसका पालन नहीं होता है। इसके लिए पुलिस-प्रशासन की लचर व्यवस्था जिम्मेदार है। एक बात और। लोगों में जागरूकता की कमी है। इससे उन्हें क्या जुर्म है और क्या नहीं, इसकी जानकारी नहीं भी होती है। ऊपर से गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा ने समाज के कई तबकों को यों ही अपराध की ओर धकेल दिया है।
समरनलाला अग्रवाल ‘सरन’, 4/363, कचहरीघाट, आगरा

जमानत की खुशी
तिहाड़ जेल अपने हाई क्लास कैदियों के लिए मशहूर हो गया है। इसमें कॉमनवेल्थ घोटाले से लेकर टू जी के आरोपी भी बंद हैं। कुछ ही दिन पहले डीएमके के एक सांसद को जमानत मिल गईं और वह तिहाड़ से बाहर आ गईं। जेल से बाहर आते ही उनका चेहरा खुशी से खिल गया। कैमरों की लाइट चमकती रही, लेकिन उनके चेहरे पर पाश्चाताप की लकीर तक नहीं दिखी। इससे पहले भी एक नेता जेल से बाहर आए, तो उनके चेहरे पर चिंता की लकीर नहीं थी। दरअसल यह जमानत की खुशी नहीं होती, यह मान बचने का फरमान होता है।
वैभव शर्मा ‘वशिष्ठ’, ईस्ट ऑफ कैलाश, नई दिल्ली

स्टेडियम की सुविधा
ठीक है कॉमनवेल्थ खेल के आयोजन में ढेरों घपले हुए। पर हमें कई स्टेडियम भी मिले हैं। देखा जाए, तो देश की राजधानी दिल्ली में आधुनिक सुविधाओं से लैस विभिन्न स्टेडियम हैं। इनका कोई विशेष इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। यह दुखद है। इन स्टेडियमों में स्कूलों के बच्चों को प्रशिक्षत किया जा सकता है। कई प्रकार की प्रतिस्पर्धाओं का आयोजन कर नई प्रतिभाओं को खोजा जा सकता है। इस प्रकार इन स्टेडियम का रख-रखाव भी बेहतर तरीके से मुमकिन होगा।
ओम प्रकार त्रेहन, मुखर्जी नगर, दिल्ली

सबको शिक्षा, सबको काम
आने वाले साल को खुशहाल बनाना है। हर भारतीय को शिक्षा व रोजगार मिले। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा। देखना है कि सरकार सफल होती है या नहीं?
राजीव, आनंद विहार, दिल्ली

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