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सेना में भी भ्रष्टाचार सामने आना दुखद

एक ऐसे वक्त में जब जनमानस में भ्रष्टाचार को लेकर उबाल हो, सेना में भी भ्रष्टाचार सामने आना दुखद है। लेकिन ऐसे छेद तो किसी भी सिस्टम में हो सकते हैं। सवाल यह है कि आपने गलत काम करने वालों को क्या सबक सिखाया ? इस मामले में सेना गर्व से कह सकती है कि उसने घोटाला होने के तीन साल के अंदर ही पहले जांच पूरी की और अब अपने वरिष्ठ अफसर के खिलाफ फैसला भी सुना दिया है। उसे कार्रवाई करने के लिए सिविल सोसायटी की सक्रियता का इंतजार नहीं है।


सुकना जमीन घोटाले में सेना के लेफ्टिनेंट जनरल रैंक  के अफसरों का दोषी पाया जाना खुद सेना और शेष देशवासियों के मनोबल पर असर तो डालेगा। 12 लाख मानव बल वाली फौज में रुपयों की खनखनाहट के आगे झुक जाने वाले लोगों की उपस्थिति से इनकार भी नहीं किया जा सकता। सवाल यह है कि आप भ्रष्टाचारियों को क्या और कैसे सबक सिखाते हैं ? इसी बात से आपकी साख बनती है। हम कह सकते हैं कि इस मामले में सुकना जमीन घोटाला एक नजीर बन गया। 2008 में ही यह विवाद सामने आया। जांच हुई और 2011 में इसमें फैसला भी आ गया। सेना ने अपने लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अफसर को भी सजा सुनाने में हिचक नहीं दिखाई। इसी देश में पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों को तक सजा नहीं हो पाती है। भ्रष्ट अफसर नेताओं के मामले जांच और अदालत में जारी सुनवाई पर ही अटक कर रह जाते हैं। लेकिन सेना में ऐसा नहीं है, यदि कोई घोटालेबाज हुआ तो वो पकड़ में जरूर आएगा और पकड़ा गया तो फिर सजा भी तय समय में होगी। वैसे भी खरीद फरोख्त या वित्तीय लेनदेन में सेना के अफसर अंतिम रूप से शामिल होते हैं, इसमें असल भूमिका तो सिविल के अफसर निभाते हैं। लेकिन चूंकि सेना के अपने कायदे हैं, इसलिए यहां जरा सी चूक पर अनुशासन का चाबुक चल जाता है। सेना का एक गुण गलतियों से सबक सीखने का भी है, यह मामला भी एक सबक देकर गया है, कोई संदेह नहीं है कि सेना भविष्य में इस बात का ध्यान रखेगी। सेना ने इस मामले में साख गंवाई नहीं है बल्कि दोषियों को सजा देकर साख बनाई है।

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