DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

ब्रह्मपुत्र की बेटी का विशाल संसार

भूपेन हजारिका के बाद इंदिरा गोस्वामी के अवसान से उत्तर-पूर्व और शेष भारत को जोड़ने वाली एक और कड़ी टूट गई है। इंदिरा गोस्वामी का सम्मान समूचे भारतीय साहित्य में रहा है। उनके विशाल हृदय में समूची मानवता की जगह थी। असंख्य लोगों की उन्होंने मदद की और इसीलिए वे असम की सरकार और विद्रोहियों के बीच संवाद स्थापित कर सकीं। यहां प्रस्तुत है उनके चर्चित उपन्यास ‘नीलकंठी ब्रज’ का एक अंश और दो समकालीन महत्वपूर्ण लेखकों यू. आर. अनंतमूर्ति और के. सच्चिदानंदन की श्रद्धांजलि।

गोपीनाथ बाजार के बीच में है बिहारी मोहन कुंज। यहां एक प्राचीन मंदिर था। मंदिर से सटा हुआ था एक पुराना दालान। बिहारी मोहन कुंज के सामने थी रहस्यमयी हाड़ावारी। इसके दरवाजे साधारण काठ के थे, किन्तु द्वार खोल भीतर जाने पर लगता, यह कोई दूसरा ही संसार है। यहां है राधा दामोदर का मंदिर। और भी अनेक कोठरियां हैं।

कबूतर के दड़बे जैसी घास-फूस से बनी झोपड़ियों में जीवंत कंकाल जैसी वे बूढ़ी विधवाएं रहती हैं, जो राधेश्यामी होकर निर्वाह कर रही हैं। बिहारी मोहन कुंज के मंदिर की पूजा आलमगढ़ का एक पुजारी किया करता था। लोग उसे आलमगढ़ी कह कर पुकारते थे। मंदिर के मालिक ब्रह्मधाम से बाहर रहते थे। आलमगढ़ी ने मंदिर-संचालन की पूर्ण स्वतंत्रता का लाभ उठाया था।

लोग कहते हैं कि अंत में आलमगढ़ी ने मूर्ति के सोने-चांदी के गहनों पर हाथ साफ कर दिए थे, किन्तु इस बीच वृंदावन के निठल्ले लड़के इसके पीछे पड़ गए। संध्या के समय वे मंदिर के सामने की चाय-दुकान पर अड्डा जमाने लगे और जाड़े के दिनों में मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ कर गजक खाया करते।

इस बीच इन निठल्ले युवकों ने ब्रजमंडल में कुछ अनोखे कारनामे कर दिखाए। एक मंदिर के देवता का कमरबंद वहां के एक कर्मचारी ने चुराया था। इन लड़कों ने उसके गले में लोहे का कमरबंद पहना कर और सजे हुए गधे पर बैठा कर भीड़ वाली गलियों से उसका जुलूस निकाला था। वृंदावन के बच्चे ही नहीं, कुआं पूजने के लिए जाती हुई गर्भवती स्त्रियों के साथ चलते हुए हिजड़े भी इस जुलूस में चीखते-चिल्लाते सम्मिलित हो गए थे।

मंदिर की सीढ़ियों पर खड़े होकर आलमगढ़ी बड़बड़ाया था- सब साले जहन्नुम में चले गए।

उस दिन से आलमगढ़ी अवश्य ही डर गया था। सीढ़ियों पर बैठ कर गजक खाने वाले लड़कों को उसने खुश करना चाहा था।

शशिप्रभा नामक एक कम आयु की विधवा मंदिर के काम में आलमगढ़ी की सहायता कर देती थी। अंत में वह आलमगढ़ी के साथ एक ही कोठरी में रहने लगी। इसे लेकर सीढ़ी पर बैठ कर गजक खाने वाले लड़कों से आलमगढ़ी को डरने की आवश्यकता नहीं थी। कई लोग ऐसी विधवाओं को रखे हुए थे। मरने के समय दो विधवाएं निश्चिंत होकर मरी थीं, क्योंकि पुजारियों ने अपनी रखैल विधवाओं का संस्कार किया था।

आलमगढ़ी इस प्रकार निश्चिंत होकर दिन काट रहा था, किन्तु अचानक एक ऐसी घटना घटी, जिससे उसकी शांति भंग हो गई। तब रात के समय मंदिर और बाजार-हाट के दरवाजे बंद हो गए थे। गली में बाहर सोने वाले भी अब तक सो गए थे। केवल मंदिर के सामने वाली बड़ी दुकान में धीमा-धीमा प्रकाश हो रहा था। आलमगढ़ी को अवश्य ही नींद नहीं आई थी। उसके पास खटिया पर निश्चिंत मन से शशिप्रभा सोयी पड़ी थी।

ठीक तभी घोड़े की टाप और तांगे के पहियों की घरघराहट सुनाई पड़ी। शोर उसके दरवाजे पर आकर थम गया। आलमगढ़ी ने खिड़की खोल कर नीचे तांगा खड़ा देखा। लालटेन की बत्ती तेज कर वह हड़बड़ी में नीचे उतर आया। आए हुए व्यक्ति के मुंह के सामने लालटेन ले जाने पर आलमगढ़ी विस्मय से अवाक रह गया। ये बिहारीकुंज के वर्तमान अधिकारी वृद्ध कृष्णकांत ठाकुर थे। लोग उन्हें ठाकुर साहब के नाम से जानते थे। उनके साथ चालीस वर्षीया अविवाहिता पुत्री मृणालिनी और मानसिक रोग से ग्रस्त उनकी पत्नी भी थी। उनके मुरझाए मुंह देख कर लगता था मानो प्रेतात्माओं का दल आधी रात के समय आकर उपस्थित हुआ है।

आलमगढ़ी ने मृणालिनी से पूछा- बिटिया, बिना खबर दिए कैसे आ गईं?
ये बातें फिर बताऊंगी, पहले पिताजी को संभालो। वे पिछले दस साल से खाट पकड़े हैं। आजकल उन्हें बिल्कुल दिखाई नहीं देता।

दोनों ने सहारा देकर उन्हें तांगे से उतारा। तांगे से उतरते समय ठाकुर साहब के घुटनों से चरमराहट सुनाई पड़ी। इस बीच शशिप्रभा भी आहट पाकर उठ गई थी। वह खटिया उठा कर बरामदे में बिछा गई। सामान भीतर उठवा कर तांगे वाले को विदा कर मृणालिनी ने भीतर प्रवेश किया। आलमगढ़ी ने पूछा- तो आज गाड़ी बड़ी देर से आई? खाने-पीने का प्रबंध किया जाए?
नहीं खाने-पीने की आवश्यकता नहीं है।
तो गरम चाय पीकर गरमाहट अनुभव कीजिए।

मृणालिनी हाथ-मुंह धोने कुएं की ओर चली गई। शशि ने बोखारी की धीमी पड़ी आंच में नए कंडे डाल दिए।
मुंह-हाथ धोकर मृणालिनी शशिप्रभा के पास आकर बैठ गई।

शायद तुम्हारा नाम ही शशिप्रभा है? तुम्हारे हाथ से मंदिर में भोग लगाना बंद करने के लिए किसी ने पिताजी को गुमनाम पत्र लिखा था। पिताजी को दिखाई नहीं देता, मुझे ही सब कुछ करना होता है। इन दोनों को लेकर मैं बड़ी मुसीबत में पड़ गई हूं।

शशिप्रभा की आंखों की पुतलियां स्थिर होकर रह गईं, किन्तु वह कुछ भी नहीं बोली। इस बीच आलमगढ़ी भी आकर बोखारी के पास बैठ गया। बिटिया, तो तुम लोग कुछ दिन रहने के लिए आए हो?

कुछ दिन के लिए नहीं, हमेशा रहने के लिए आ गए हैं। घर का सब साज-सामान बेच कर आए हैं। लगता है हमारी हालत के बारे में आपने सुना नहीं है?

श्रीधाम आने वाले लोगों के मुंह से कुछ सुना है। तुम्हारे दो भाई भी तो हैं?

आप सब कुछ जान कर भी अनजान बन रहे हैं। बड़े भाई की मृत्यु मौलानापुर के गोलीकांड की दुर्घटना के समय गोली लगने से हुई। क्या आपसे यह छिपा है?
उसकी पार्टी के कुछ लोग अंधेरे में छुपकर आए और बता गए कि यह पार्टी के नाम पर गुंडागर्दी कर रहा था। मौलानापुर में गोली से भून दिए जाने पर मुझे ही उनके शव की शिनाख्त के लिए जाना पड़ा था। ये सब बातें मुझे याद मत दिलाइए।
शशि, जाओ चाय ले आओ।

मृणालिनी की बातें सुनकर शशि के आश्चर्य की सीमा न रही। वह चाय बनाना छोड़ मृणालिनी के मुंह की ओर देखती रह गई।

सुना था तुम्हारा छोटा भाई भी ठीक रास्ते पर नहीं चल रहा है।
वह भी इसी पार्टी में है। रात के अंधेरे में छिप कर वह कभी-कभी आता है। जब भी आता है, राक्षस बन कर आता है। भूख की मार से वह अजीब-सा लगता है। उसे देख डर से मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ जाते हैं। तीन जनों के हिस्से का पूरा भात उसकी थाली में डाल कर मैं उसके पास सिकुड़ी-सिकुड़ी बैठी रहती हूं। खाते समय वह बोलता रहता है- अब बहुत दिन नहीं हैं। एक प्रचंड क्रांति होगी। असंख्य लोग मरेंगे। दीदी, इस बात का दु:ख न करना कि जीवन में कुछ नहीं मिला। यह तेरा सौभाग्य है कि तू यह क्रांति देख सकेगी। मुझे पूरा विश्वास है कि तू अवश्य ही यह क्रांति देखेगी। आलमगढ़ी जी, मुझे भय लगा रहता है न जाने वह कब किसको मार कर आ जाए।

मृणालिनी का मुंह पीला पड़ गया। नथुनों के पास दोनों ओर रेखाओं के उभर आने से वह प्रौढ़ा दिखाई पड़ने लगी थी। पृथ्वी पर उसे सबसे बड़ा भय यही था कि एक दिन उसका भाई नरहत्या करेगा।


‘उन्होंने उत्तर-पूर्व और शेष भारत को जोड़ने वाला सांस्कृतिक पुल बनाया था’
चौदह नवम्बर को उत्तर-पूर्व के शहर गुवाहाटी में एक जमींदार खानदान में पैदा हुई मामोनी रायसम गोस्वामी वाकई असमिया ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थीं। उन्होंने अपने लेखन और व्यक्तित्व दोनों तरह से साहित्य की दुनिया में अपना एक खास मुकाम बनाया। उनका लोहा आज भारतीय साहित्य के बड़े से बड़े लेखक मानते हैं।

अपने बेहद लोकप्रिय उपन्यास ‘संस्कार’ के माध्यम से धर्म की रूढ़िवादिता और प्रगतिशील सोच के द्वंद्व को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करने वाले कन्नड़ के महान लेखक यू. आर. अनंतमूर्ति तो यह खबर सुन कर स्तब्ध रह गए। उन्होंने कहा, ‘मैं सोच भी नहीं सकता कि इंदिराजी इस तरह हम सबको छोड़ कर अचानक चली जाएंगी। वास्तव में वह एक महान लेखिका थीं। उनके लेखन पर गौर करने पर यह पता चलता है कि वह पूरे देश के बारे में सोचती थीं।’

इंदिरा गोस्वामी लेखिका होने के साथ-साथ एक शांति दूत भी थीं। यू. आर. अनंतमूर्ति ने उनके इस योगदान को याद करते हुए कहा, ‘इंदिराजी ने असम में सक्रिय चरमपंथी संगठन उल्फा और भारत सरकार को बातचीत के लिए राजी किया। वो नहीं चाहती थीं कि भटक कर उल्फा में शरीक हो गए नौजवान मारे जाएं। वो उनको भी समझाती थीं और सरकार को भी उनके साथ बातचीत करने की सलाह देती थीं।

अब जबकि इंदिराजी नहीं रहीं तो मैं भारत सरकार और उल्फा दोनों से कहूंगा कि वे इस सिलसिले में इंदिराजी के प्रयासों को शिद्दत से समझों और आपस में बातचीत करके असम में शांति का माहौल बनाएं। इंदिराजी की पर्सनल लाइफ अच्छी नहीं रही। उन्होंने जिंदगी में काफी तकलीफें सहीं।

इसकी एक वजह शायद यह हो सकती है कि वो बहुत इमोशनल थीं, लेकिन जहां तक उनके लेखन का सवाल है, वास्तव में उनकी रेंज बहुत थी।’

इंदिरा गोस्वामी को याद करते मलयालम के प्रसिद्ध लेखक और साहित्य अकादमी के पूर्व सचिव क़े सच्चिदानंदन बोले, ‘मैं इंदिराजी को 1992 से जानता हूं। उसी साल मैं दिल्ली आया था और उनसे पहली बार मिला था। उसके बाद मैंने उनको कई बार साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों और सेमिनारों में बुलाया। उनके कुछ उपन्यास बहुत अच्छे हैं। असम की आम जनता को केंद्र में रख कर उन्होंने कई महत्वपूर्ण रचनाएं लिखीं, खासकर वहां की स्त्रियों के बारे में। वृन्दावन में रह कर उन्होंने विधवाओं के जीवन की समस्याओं को भी उठाया।

हालांकि वो प्रगतिवादी विचारधारा की नहीं थीं, लेकिन लेखिका के रूप में वो हमेशा आम जनता के साथ जुड़ी रहीं। उनके लेखन के केंद्र में देश की आम जनता है। असमिया और हिंदी रामायण का उन्होंने तुलनात्मक अध्ययन किया। दिल्ली यूनिवर्सिटी से रिटायर होने के बाद वो रावण के ऊपर एक किताब लिखना चाह रही थीं। उन्होंने इस पर काम करना भी शुरू कर दिया था। उनकी रुचि अलग-अलग रामायणों में वर्णित रावण के चरित्र को नई दृष्टि से देखने में थी।

रावण के ऊपर लिखी मेरी एक कविता पर उन्होंने बातचीत करते हुए मुझे यह सब बताया था। इसी साल के शुरू में जब दिल्ली में इंदिराजी की तबीयत खराब हुई थी तो मैं उनको देखने गया था। वो बेहोश थीं। फिर बाद में उनको गुवाहाटी ले जाया गया। वहीं उनका इलाज चल रहा था... लेकिन! खैर, वो दिल की बहुत अच्छी थीं। उनका कभी किसी के साथ कोई मनमुटाव नहीं हुआ। वो सबके साथ बड़ी सहजता से मिलती थीं।’

इंदिराजी के काफी करीब रहे लेखक उनकी निजी जिंदगी के दर्दनाक पहलुओं को बड़ी शिद्दत और तकलीफ के साथ बयां करते हैं। के. सच्चिदानंदन ने बताया, ‘विवाह के बाद बहुत कम दिनों तक ही वो पति के साथ रह पाईं, क्योंकि एक सड़क हादसे में उनके पति का निधन हो गया था। उसके बाद पूरी लाइफ वो अकेली रहीं। हालांकि वो अपने पति को कभी भूल नहीं पाईं, लेकिन बाद की जिंदगी में उन्होंने शब्दों को ही अपना पति मान लिया था।

समकालीन फिक्शन में इंदिरा गोस्वामी का बड़ा  योगदान है। यू. आर. अनंतमूर्ति और इंदिरा गोस्वामी ने आधुनिक साहित्य को एक अलग निगाह से देखा। ये दोनों पूरी जिंदगी यथार्थवादी लेखन ही करते रहे। इस परंपरा में इंदिरा गोस्वामी आखिरी कड़ी थीं।

बीसवीं सदी के भारतीय सामाजिक यथार्थ की जटिलता को अभिव्यक्त करने वाली आखिरी लेखिका थीं इंदिरा गोस्वामी।’
प्रस्तुति: शशिकांत

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:ब्रह्मपुत्र की बेटी का विशाल संसार