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खुदरा में एफडीआई का विरोध सिर्फ राजनीति है

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बाद शायद उन्हें ही देश में उदारीकरण का सबसे बड़ा समर्थक माना जाता है। मनमोहन सिंह ने जब वित्त मंत्री के तौर पर उदारीकरण की शुरूआत की थी, तो उन्हें उनका दाया हाथ माना जाता था। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया इन दिनों किराना कारोबार में विदेशी निवेश का समर्थन सबसे मुखर ढंग से कर रहे हैं। सरकार की इस नीति के विभिन्न पहलुओं पर मोंटेक सिंह अहलूवालिया की राय को विस्तार से जानने की कोशिश की प्रधान संवाददाता हरिकिशन शर्मा ने। बातचीत के अंशः

खुदरा कारोबार को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए खोलने के फैसले का चौतरफा विरोध हो रहा है, आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
हर कोई इस बात से सहमत होगा कि मौजूदा आपूर्ति श्रृंखला में कई खामियां हैं। किसानों को उनकी उपज का उचित दाम नहीं मिलता, जबकि उपभोक्ताओं को काफी अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। आपूर्ति तंत्र में अक्षमता, बिचौलियापन तथा बरबादी है।

मार्केटिंग श्रृंखला में यह अक्षमता अनाज की अपेक्षा शीघ्र खराब होने वाली वस्तुओं जैसे सब्जियों और फलों, दूध, अंडे तथा प्रोटीनयुक्त अन्य खाद्य वस्तुओं के मामले में ज्यादा है। ऐसी उपज और उत्पादों को रखने के लिए पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज वगैरह की व्यवस्था नहीं है, जिसके चलते काफी चीजें बरबाद हो जाती हैं। इसकी भरपाई उपभोक्ता को अधिक मूल्य चुकाकर तथा किसानों को अपना सामान सस्ता बेचकर करनी पड़ती है। योजना आयोग का मत रहा है कि कृषि विपणन श्रृंखला का आधुनिकीकरण हमारी बुनियादी जरूरत है। आप घरेलू निवेश के जरिये भी ऐसा कर सकते हैं और यह पिछले दो-तीन वर्षों से हो रहा है। एफडीआई की इजाजत से यह होगा कि भारतीय खुदरा व्यापारी विदेशी निवेश जुटा सकेंगे, जबकि विदेशी खुदरा व्यापारी यहां आकर कारोबार कर सकेंगे।

कहा जा रहा है कि इससे किसानों और उपभोक्ताओं को नुकसान होगा?
मेरे विचार में अगर आप किसानों और उपभोक्ताओं की फिक्र करते हैं, तो यह सबसे अच्छा काम है। अगर कोई कहता है कि किसानों के साथ धोखा होगा, तो मेरे विचार में यह दावा बेबुनियाद है।

विपक्ष का कहना है कि इससे बहुत से लोग बेरोजगार हो जाएंगे?
जो कंपनियां यहां आएंगी उनके लिए उनकी साझीदार भारतीय कंपनियां होंगी। हम उनके लिए कोई विशेष आयात नीति नहीं बना रहे। सामान तो अब भी आयात हो रहा है। आप लोकनायक भवन या किसी अन्य इलेक्ट्रोनिक बाजार में जाइए, आपको वहां लैंपसेट और दूसरी चीजें भारत में बनी हुई भी मिलेंगी और चीन में बनी हुई भी। मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं कि अगर आप एफडीआई लाकर अपने खुदरा क्षेत्र का आधुनिकीकरण करते हैं, तो उससे उन्हें आयात का अधिक फायदा होगा। आधुनिकीकरण हो जाए, तो इन्हीं स्टोर में हमारे घरेलू उत्पादों को रखकर पता चल जाएगा कि कौन से उत्पाद बिकते हैं। अगर ये कंपनियां अंतरराष्ट्रीय हैं, तो वे अन्य देशों में भी भारतीय उत्पादों को लेकर जा सकती हैं।

...फिर दिक्कत क्या है?
हमें अपने आप पर भरोसा करना चाहिए। जो लोग ये बातें कर रहे हैं, उनका मानना है कि हिन्दुस्तान में इस समय कोई प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं कर सकता और अगर कोई आएगा, तो हिन्दुस्तान मिट जाएगा। देखिए, जब दूसरे क्षेत्रों में ऐसा नहीं हुआ, तो हम क्यों सोचते हैं कि इस क्षेत्र में ऐसा होगा।

सरकार के समर्थक दल भी इसका विरोध कर रहे हैं, ऐसा क्यों?
अगर मीडिया में सही बात आएगी, तो लोगों को पता चलेगा कि जो भी विरोध हो रहा है, वह बेमतलब बकवास है। उनके लिए (भाजपा नेतृत्व वाले राजग) वर्ष 2002 में यह फैसला करना उचित था, जबकि स्थिति में बदलाव आने के बावजूद वह वर्ष 2011 में इसका विरोध कर रहे हैं। आज भारत कहीं बड़ी और मजबूत स्थिति में है और भारतीय कंपनियां दुनिया भर में परचम लहरा रहीं हैं।

एक बार खुदरा क्षेत्र का आधुनिकीकरण होने के बाद मुझे नहीं लगता कि भारती, बियानी और रिलायंस अपने स्टोर थाइलैंड में क्यों नहीं खोलेंगे। लेकिन ऐसा करने से पहले उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा साबित करनी होगी। यह विरोध पूरी तरह राजनीति से प्रेरित है। असल में कुछ लोग विवाद खड़ा कर मीडिया का ध्यान खींचने के लिए यह सब करते हैं। मुझे उम्मीद है कि इस मुद्दे पर संसद में विचार-विमर्श होगा, तो इसकी खूबियां और खामियों पर चर्चा होगी। यह विरोध पूरी तरह बकवास है। उनको असलियत पता ही नहीं है।

राज्य सरकारों ने भी इसका विरोध किया है, इसे लागू कैसे किया जाएगा?
सरकार ने जो नीति निकाली है, उसमें राज्य सरकारों को पूरी आजादी है। जो राज्य सरकारें चाहती हैं, वे लागू कर लें और जो नहीं चाहती हैं, वे नहीं करें। हम उन पर कोई दबाव नहीं बना रहे। दरअसल खुदरा कारोबार के लिए स्थानीय लाइसेंस चाहिए। हम तो किसी पर दवाब नहीं डाल रहे कि एक राज्य ने अपने यहां रिटेल खोला है, तो आप भी खोलिए। अगर राज्य नहीं चाहता है, तो नहीं होगा।

कहा जा रहा है कि पहले मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में सुधार होने चाहिए, फिर रिटेल में एफडीआई आनी चाहिए?
मैन्युफक्चरिंग में कई सुधार हो चुके हैं। इसलिए मैं इस विचार से सहमत नहीं हूं। अब देखिए टाटा नैनो भारतीय प्रौद्योगिकी से बनकर पूरी दुनिया में निर्यात हो रही है। यह कहना है कि विनिर्माण में सुधार नहीं हुए हैं, गलत है। या तो वे हमें बताएं कि कौन से रिफॉर्म चाहते हैं, तो मैं इसका समर्थन करूंगा, लेकिन यह बेकार दलील है।

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