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साहित्य एफडीआई का दर्पण है

जैसी एफडीआई, वैसा साहित्य। जितनी एफडीआई, उतना साहित्य। जहां की एफडीआई, वहां का साहित्य। साहित्य उसी का सच है। एफडीआई न होती, तो साहित्य न होता। साहित्य न होता, तो यह दिल्ली न होती। एफडीआई न होती, तो कविता बिलकुल न होती। कहानी उपन्यास आलोचना का बीज तक न पनपता।

एफडीआई साहित्य पारदर्शी है। साहित्य के एक-एक शब्द में एफडीआई है। हे सखे! अकादमी से निकल यह जो आदमी फुर्तीले कदमों से अपनी टैक्सी की ओर बढ़ा जा रहा है, जिसके हाथ में एक बरानकोट है, दूसरे में ब्रीफकेस है, नाक पर चश्मा है और पत्नी गाड़ी में बैठी इंतजार कर रही है, वह अब आईजीआई के टी थ्री की ओर लपका जा रहा है। यह साहित्य का एफडीआई व्यक्तित्व है। इससे पहले उसे सन सतत्तर में कुर्ता-धोती में पैदल जाना होता था।

यह आदमी जो आईआईसी में दो प्राचीनाओं-तीन नातिनवीना काव्य रसिकाओं से एक वाक्य में पांच एफडीआई कवियों गपिया रहा है, जिसकी एफडीआई मधुर वाणी सुन वे चकित चकोरी हुई जा रही हैं कि ‘इन एफडीआईयों में से एक ठो हमें दे दो। पार्टी पक्की’ कहती हुई साहित्य की उस नीमशीत शाम में विलय हो रही हैं।

इतिहास गवाह है। हिंदी साहित्य में ईलियट यों दावत का फालतू भोजन की तरह पड़े रहते थे। कहीं ईलियट के हलवे के दोने को विलियम एंपसन साफ कर रहा होता, तो कहीं गोर्की के गुलाब जामुन को चेखव का गिरगिट चख रहा होता। एफडीआई न होती, तो बड़े सुकुल जी भी न होते। सोचो तब क्या होता?

साहसी मैकाले ने कहा- आर्यजनो आप विरोध करते रहना, पहले अंग्रेजी की इतनी एफडीआई ले लो और भय्याजी सब रस्मानुसार विरोध करते हुए लाइन लगा लिए। एफडीआई न होती, तो आजादी की लड़ाई न होती। तब इतने ‘बार एट लॉ’ न होते और अब इतने ‘वार एट लॉ’ भी न होते। कांग्रेस न होती। गांधी ने जितना विदेशी कपड़ा जलवाया, उससे ज्यादा विदेसी सूट तो उस साहित्यकार के पास निकलेंगे, जो साहित्य की बदबू कहलाता है।

संसद में साहित्य होता, तो एफडीआई का ऐसा विरोध न होता। संसद भवन खुद विक्टोरियाई एफडीआई है। संसदीय प्रणाली एफडीआई है। हर घर का छोरी-छोरा एफडीआई हुआ पड़ा है। मोबाइल, फेसबुक अकांउट, ट्विटर, ओरकुट, चाल-ढाल, तौर-तरीके-तेवर सब एफडीआई हैं। मीडिया एफडीआई। एनजीओ एफडीआई है।

हमें तो लगता है कि समुद्र मंथन से जो निकला, वो तब का एफडीआई था। मंदराचल पर्वत के पाताल तोड़ते ही पातालवासियों ने अपने रतन निकाल कर ऊपर को सरका दिए कि ले लो और हमारी जान छोड़ो। देवासुर इतने से ही प्रसन्न हो गए। भइए एफडीआई पुराण की लीला अपरंपार है। सांसद सब जानते हैं, तभी तो विरोध करते रहते हैं। विरोध भी एफडीआई की लीला है। विरोध अच्छा सगुन है।

वॉलमार्ट, कोरफुर के लिए यह हिंदी लेखक चश्मे सहित पलक पावंडे बिछाए है। वॉलमार्ट होगा, तो सब कुछ होगा, सात मंजिला मॉल में पांच किलोमीटर फ्लोर स्पेस में बड़ा चमचम काफी हाउस होगा, मोहन सिंह प्लेस छाप से कहीं ज्यादा चमचम। आह! कहीं ऑक्सफोर्ड, कहीं केम्ब्रिज की किताबें, कहीं राजकमल, वाणी, कितबाघर की किताबें होंगी। फिर एक दिन वॉलमार्ट में गोष्ठी की जगह बनेगी। आईआईसी, हेबिटेट को छोड़ साहित्य के पंछी अपने तिनके चुनकर यहीं प्रेम की एक जगह खोंजगे, लेकिन जहां गाजियाबादी अल्का पांडेजी का प्रवेश न होगा।

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