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मर गये प्रधानाचार्य, मगर नहीं मिला वेतन

वेतन भुगतान की मांग करते-करते प्रधानाचार्य इस दुनिया से ही चले गये, लेकिन बकाया वेतन उन्हें नहीं मिल सका। रिटायरमेंट के लगभग 20 साल बाद उनकी मौत हो गयी, तब तक वह लगभग नौ साल का बकाया वेतन पाने की कोशिश करते रहे। लेकिन व्यवस्था हमेशा उनके आड़े आती रही। न्यायालय समेत विभागीय उच्च अधिकारियों के 33 आदेश के बाद भी वेतन भुगतान की राह में डीआईओएस कार्यालय रोड़ा बना रहा। अब बकाया वेतन पाने के लिए उनका बेटा संघर्ष कर रहा है। यह कहानी है आर्य इंटर कालेज लेदुका के प्रधानाचार्य रहे स्वर्गीय धर्मदेव आर्य की।

आर्य इंटर कालेज लेदुका की स्थापना धर्मदेव के पिता ने की थी। वर्ष 1950 में धर्मदेव इस कालेज में बतौर सहायक अध्यापक नियुक्त हुए। 1057 में उन्हें प्रिंसिपल बना दिया गया। 1983 में विद्यालय की प्रबंध समिति में विवाद शुरू हो गया, जिसकी वजह से अगस्त1979 से उनका वेतन रोक दिया गया। वेतन रोके जाने के खिलाफ वह विभागीय उच्च अधिकारियों की शरण में पहुंचे। तत्कालीन वित्त निदेशक ने प्रक रण की जांच करवाने के बाद दो मई 1980 को वेतन भुगतान का आदेश जारी किया। वह आदेश लेकर डीआईओएस कार्यालय का चक्कर काटते रहे और 1988 में वह रिटायर्ड भी हो गए, लेकिन बकाया भुगतान के लिए संघर्ष जारी रखा।
इसी क्रम में वर्ष 2002 में उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 2006 में फैसला आया कि 1988 में रिटायर्ड मानकर उनका बकाया वेतन दे दिया जाय। इसके बाद संयुक्त शिक्षा निदेशक ने भी आर्डर किया। मैनेजमेंट ने भुगतान के लिए उनका बिल भी प्रस्तुत कर दिया। लेकिन उन्हें वेतन का बकाया नहीं मिला। इस बीच 4 मई 2008 को प्रधानाचार्य का निधन हो गया। अब पिता के वेतन भुगतान के लिए उनके बेटे देवबंधु आर्य संघर्ष कर रहे हैं। देवबंधु का आरोप है कि सुविधा शुल्क न देने पर विभाग ने वेतन का भुगतान लटका दिया है। 

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