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सवाल संसद की गरिमा का

अगस्त में जब अन्ना हजारे दिल्ली के रामलीला मैदान पर अनशन कर रहे थे, तब टेलीविजन के उद्घोषक उत्तेजित होकर घोषणा कर रहे थे कि हम भारत के तहरीर चौक को देख रहे हैं। वे गलत थे। मिस्र और बाकी अरब देशों में जिस तरह के आंदोलन हो रहे हैं, वैसे भारत में बहुत पहले हो चुके हैं। 20 के दशक में असहयोग आंदोलन, 30 के दशक में सिविल नाफरमानी आंदोलन और 40 के दशक में भारत छोड़ो आंदोलन इसकी मिसाल हैं। इन आंदोलनों में करोड़ों भारतीयों ने हिस्सा लिया। इनके दबाव में अंग्रेजों ने आखिरकार भारत छोड़ दिया। लेकिन यह आंदोलन सिर्फ विरोध और जेल में जाने के आंदोलन नहीं थे। उनमें एक दूरदृष्टि भी थी। इनके नेता गंभीरता से उस राजनीतिक तंत्र के बारे में सोचते थे, जो एक गरीब, विशाल और विभाजित समाज के लिए सबसे उपयुक्त था। उनके विचार और आदर्श आखिरकार भारतीय संविधान में शामिल किए गए। जिसके आधार पर एक बहुदलीय लोकतंत्र की स्थापना हुई।

हमारे देश में 15 आम चुनाव हो चुके हैं और राज्यों के कई सारे चुनाव हुए हैं। हमारे पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन और बर्मा व अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के दजर्नों देशों की तरह हमारे यहां फौज का राजनीतिक प्रक्रिया में कोई दखल नहीं है। मिस्र, टय़ूनिशिया, यमन और दूसरे देशों में आंदोलनकारी एक ऐसी बात के लिए लड़ रहे हैं, जो उन्होंने अपने जीवनकाल में नहीं देखी। वे चाहते हैं कि फौजें अपनी बैरकों में वापस जाएं और जनता को अपना नेता चुनने का हक मिले। जिस वक्त मध्य-पूर्व के देश लोकतंत्र के पहले कदम के लिए लड़ रहे हैं, उसी वक्त भारतीय अपनी उन लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर करने के लिए मेहनत कर रहे हैं, जो हमारे पूर्वजों ने हमें दी हैं।

इस गिरावट का बहुत बड़ा लक्षण उस तरीके में दिखाई देता है, जिस तरीके से जन प्रतिनिधि संसद में आचरण करते हैं। अगर किसी का सरकार की प्रस्तावित नीति या कानून से मतभेद है, तो सही तरीका यह है कि उसके खिलाफ संसद में भाषण दिया जाए। इसके बजाय विपक्षी दल वाले चीखते-चिल्लाते हैं, सदन के बीच में दौड़ जाते हैं और विधानसभाओं में तो माइक और कुर्सियां तक फेंकते हैं। ऐसा करके वे सोचते हैं कि वे सत्ताधारी पार्टी की अवमानना कर रहे हैं, लेकिन दरअसल वे सदन की और अपने मतदाताओं की अवमानना कर रहे होते हैं। संसद नौ दिन से ठप है। इसमें नया कुछ नहीं है।

14वीं लोकसभा का 22 प्रतिशत वक्त ऐसे व्यवधानों से बरबाद हुआ है। अखबारों की खबरों में अक्सर आर्थिक नुकसान बताया जाता है। सन 2010 की एक हेडलाइन ‘संसद के 17 दिन का कामकाज न चलने से देश को 132 करोड़ रुपये का नुकसान’, लेकिन इसके ज्यादा गंभीर दूरगामी प्रभाव होते हैं। इससे उन बिलों का पास होना रुक जाता है, जो बेहतर प्रशासन, समावेशी विकास और जनता को बेहतर सेवाएं देने के लिए होते हैं।

संसद का ताजा बॉयकॉट भारतीय जनता पार्टी ने किया है। पहले इस पार्टी की जिद यह थी कि वह तब तक संसद नहीं चलने देगी, जब तक गृहमंत्री पी. चिदंबरम इस्तीफा नहीं दे देते। कभी विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस ने ऐसे ही तत्कालीन रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नाडीज का बहिष्कार किया था। यह चल ही रहा था कि फिर कामकाज रिटेल क्षेत्र में विदेशी निवेश को लेकर रुक गया।

समाजशास्त्री आंद्रे बेते का कहना है कि एक कामकाजी लोकतंत्र सरकार और विपक्ष के बीच सम्मानपूर्ण रिश्ते पर निर्भर करता है। मैं यह लेख इंग्लैंड से लिख रहा हूं, जहां लोकतांत्रिक कामकाज का महत्वपूर्ण हिस्सा प्रधानमंत्री का प्रश्नकाल है, जिसमें सरकार के मुखिया को विपक्ष के सदस्यों की आलोचनाओं का जवाब देना होता है। किसी भी इंग्लैंडवासी को यह याद नहीं है कि कभी यह प्रश्नकाल माइक फेंकने या सदस्यों के वॉक आउट की वजह से कभी खंडित हुआ हो।
भारत में दोनों बड़ी पार्टियों के बीच संबंध पूरी तरह टूट चुके हैं। इसके लिए दोनों ही जिम्मेदार हैं।

भाजपा ने अपने नेताओं को बहुत भद्दे ढंग से प्रधानमंत्री और संप्रग अध्यक्ष की आलोचना करने के लिए प्रोत्साहित किया। जैसे यशवंत सिन्हा ने प्रधानमंत्री को शिखंडी कहा या नरेंद्र मोदी ने रोमराज का जुमला उछाला था। दूसरी ओर कांग्रेस ने भाजपा की शायद ही कभी राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सलाह ली हो। पाकिस्तान और कश्मीर के मुद्दे इसके उदाहरण हैं।

इसी तरह लोकपाल बिल भी है। अन्ना हजारे के पहले अनशन की वजह से सरकार ने लोकपाल बिल बनाने के लिए एक संयुक्त समिति बनाई। होना यह चाहिए था कि विपक्ष के कुछ सदस्य भी इस समिति में होते। इनकी जगह पांच केंद्रीय मंत्रियों के साथ टीम अन्ना के कुछ लोग ही इसमें शामिल थे। अन्ना हजारे की टीम के सदस्य ऐसे किसी आंदोलन का नेतृत्व करने के काबिल नहीं हैं, जो लोकतंत्र को बेहतर बनाने का दावा करता हो। इन स्वयंभू सिविल सोसाइटी के नुमाइंदों के अंदर शायद कोई छोटा-मोटा तानाशाह बाहर आने की राह देख रहा है। इस प्रवृत्ति को मीडिया ने भी बढ़ावा दिया है।

यह चक्र टूटना चाहिए। लेकिन कैसे? शुरुआत किसी बड़े कांग्रेस नेता और बड़े भाजपा नेता के बीच निजी और प्रचार से दूर बैठक से की जा सकती है। ये नेता कौन हो सकते हैं। प्रधानमंत्री तो नहीं हो सकते। क्योंकि सात साल प्रधानमंत्री के पद पर रहने के बावजूद उन्होंने लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा। ज्यादा विश्वसनीय नेता सोनिया गांधी हो सकती हैं, जो खुद तीन बार लोकसभा के लिए चुनी जा चुकी हैं और यूं भी राजनीतिक दृष्टि से वह मनमोहन सिंह से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। शायद उन्हें सुषमा स्वराज के साथ बैठक करनी चाहिए, जो खुद कई बार लोकसभा में रह चुकी हैं और फिलहाल लोकसभा में विपक्ष की नेता हैं। इस बैठक में व्यक्तिगत आक्षेपों पर पाबंदी और सरकार और विपक्ष के बीच नियमित सलाह और संवाद पर सहमति बनाई जा सकती है। राजनीति एक गंभीर व्यापार है। जिसका मूल तत्व प्रतीकों से बेहतर या बदतर बनाया जा सकता है।

जिन अरब नागरिकों को लोकतंत्र कभी नहीं मिला, वे इसके लिए जी-जान से लड़ रहे हैं। हम जिन्हें कई पीढ़ियों से यह मिला हुआ है, लेकिन हम उसे शब्द और कर्म के स्तर पर गंदा कर रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र को फिर से अपनी जगह दिलाने के लिए हमें सबसे पहले संसद की गरिमा को स्थापित करना होगा। इन दो महिलाओं के बीच एक सहज आमने-सामने की बातचीत से शायद एक नई शुरुआत हो सके।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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