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फिर उस जलन से निकलते हैं लतीफे

दूसरी जातियों, समाजों और संप्रदायों पर लतीफे अच्छे नहीं माने जाते। लेकिन दुनिया भर में ऐसे लतीफों की भरमार होती है। ये लतीफे आमतौर पर उन पर बनाए जाते हैं, जो दूसरों से बेहतर हाल में होते हैं। हमारे यहां बाबाजी पर लतीफे हैं, जो पारसियों पर बनाए गए हैं। मारवाड़ियों पर भी लतीफों की कोई कमी नहीं है। लेकिन सबसे ज्यादा लतीफे सरदारों पर बनाए गए हैं। मजेदार बात यह है कि उनमें से ज्यादातर सिखों ने ही बनाए हैं। मेरा मानना है कि अपने में भरोसा करने वाला ही खुद पर लतीफा बना सकता है।

इधर बदकिस्मती से सिखों ने अपने में भरोसा खोया है। वे दूसरों की तरह लतीफों को बेवजह दिल पर लेने लगे हैं। ऐसे में उस पर पूरी किताब लाने के लिए तो हौसला चाहिए था। यह हौसला दिखाया है, भाई निरंजन सिंह अमेरिका वाले ने। उनकी किताब रूपा से आई है, ‘बंताइज्म: द फिलॉसफी ऑफ सरदार जोक्स।’ लतीफों में क्या फलसफा हो सकता है? लेकिन उससे चिढ़कर जरूर कुछ सिख कोर्ट कचहरी जा सकते हैं।

मैं एक लतीफा पेश करना चाहता हूं। ‘एक रेस्त्रां में बंता सिंह अकेला बैठा चाय पी रहा था। दूसरी टेबल पर एक जोड़ा बैठा था। लड़के ने अपनी दोस्त से पूछा, ‘खाली पेट कोई कितनी चाय पी सकता है?’ लड़की ने सोचते हुए कहा, ‘तीन।’ उसका दोस्त मुसकराते हुए बोला, ‘नहीं, गलत जवाब है।’ लड़की चिढ़ते हुए बोली, ‘तब, क्या सही जवाब है?’ लड़के ने कहा, ‘परेशान मत होओ। जरा सोचो। सही जवाब है...एक। जब तुम एक कप चाय पी लोगी तो वह खाली कैसे रह जाएगा?’

उसके बाद दोनों हाथ में हाथ डाले निकल गए और बंता सोचता रहा। कितना अच्छा लतीफा है। मेरी बीवी उसे जरूर पसंद करेगी। शाम को वह घर पहुंचा। उसने अपनी बीवी से पूछा, ‘अरी जीतो, खाली पेट कोई कितनी चाय पी सकता है?’ उसने तमक कर जवाब दिया, ‘मैं चाय पसंद नहीं करती। पांच साल की शादी के बाद तुम्हें इतना भी नहीं पता! मैं समझ गई तुम मुझे कितना चाहते हो।’

अब बंता ने उससे कहा कि वह सिर्फ एक पहेली की बात कर रहा है। आखिर एक जवाब देने में क्या जाता है? वह बोली, ‘सवाल ही पैदा नहीं होता।’ काफी समझाने-बुझाने के बाद उसने कहा, ‘अच्छा दो।’ बंता उखड़ गया। बोला, ‘बेवकूफ औरत। अगर तुमने तीन कहा होता, तो मैंने तुम्हें एक जोरदार लतीफा सुनाता।’

एक ऐसा समाज जिसकी आबादी देश की दो फीसदी है। उसने देश को कमाल का प्रधानमंत्री दिया है। ऐसा प्रधानमंत्री जो ईमानदार है और बेहद कारगर है। साथ ही वह बहुत विनम्र है। अपने देश के आनेवाले कल की प्लानिंग करने वाले मोंटेक सिंह आहलूवालिया भी सरदारजी ही हैं। कुछ पहले तक हमारी आर्मी के चीफ भी सरदारजी ही थे, जनरल जे. जे. सिंह। जाहिर है उस समाज से जलन तो होगी ही। और फिर उस जलन से लतीफे तो निकलेंगे ही।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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