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चीन की आक्रामकता

चीन दलाई लामा के मुद्दे पर कुछ ज्यादा संवेदनशीलता दिखा रहा है। पिछले दिनों दलाई लामा कोलकाता में एक कार्यक्रम में थे, जिसमें राज्यपाल एमके नारायणन और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी होना था।

चीन ने पश्चिम बंगाल सरकार को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें यह मांग की गई थी कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री इस कार्यक्रम में न जाएं। यह मांग नहीं मानी गई, राज्यपाल उस कार्यक्रम में शामिल हुए, और मुख्यमंत्री अपनी मां की बीमारी की वजह से उसमें शामिल नहीं हो पाईं, लेकिन उनके प्रतिनिधि के तौर पर तृणमूल सांसद डेरेक ओब्रायन शामिल थे। भारत ने इस बात का विरोध दर्ज करने का फैसला किया है कि चीन ने पश्चिम बंगाल सरकार को ऐसी चिट्ठी क्यों लिखी।

कुछ ही दिन पहले चीन ने नई दिल्ली में बौद्ध विद्वानों के सम्मेलन को रद्द करने की मांग की थी, जिसे दलाई लामा को संबोधित करना था। जब चीन की यह बात नहीं मानी गई, तो उसने सीमा विवाद पर प्रस्तावित बैठक में शामिल न होने का फैसला किया। चीन सरकार यह जानती है कि दलाई लामा भारत में शरण लिए हुए हैं और अब तक वह उनकी गतिविधियों पर ज्यादा विरोध नहीं करती थी। भारत सरकार भी दलाई लामा और दूसरे तिब्बतियों की राजनीतिक गतिविधियों को बहुत प्रोत्साहित नहीं करती थी।

लेकिन अब चीन के रुख में परिवर्तन आया है और उसने ज्यादा आक्रामक रुख अपना लिया है। मसलन देश के एक राज्य की सरकार के मुखियाओं को क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए, यह सीधे तौर पर किसी विदेशी सरकार को नहीं बताना चाहिए। चीन दूसरे देशों पर भी यह दबाव डाल रहा है कि वे दलाई लामा का बहिष्कार करें। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा चीन के विरोध के बावजूद दलाई लामा से मिले, मंगोलिया की सरकार ने भी एक समारोह में चीन के विरोध के बावजूद दलाई लामा को बुलाया। वहीं दक्षिण अफ्रीका और कंबोडिया की सरकारों पर चीन का दबाव काम कर गया।

दरअसल चीन खुद को एक महाशक्ति मानता है और मनवाना भी चाहता है। अर्थव्यवस्था और फौजी ताकत के आधार पर तो वह महाशक्ति है, लेकिन जिसे ‘सॉफ्ट पावर’ कहा जाता है। यानी सांस्कृतिक, सामाजिक स्तर पर चीन का कोई खास प्रभाव नहीं है। चीन अपनी संस्कृति और समाज का प्रचार तो करना चाहता है, लेकिन वह लोकतांत्रिक देश नहीं है, इसलिए उसका प्रभाव नहीं पड़ता। उसकी जिद यह है कि उसके नियंत्रित और आधिकारिक प्रचार के सहारे ही चीन का सांस्कृतिक दबदबा बने, जो संभव नहीं। इससे चीन की जिद और आक्रामकता ज्यादा बढ़ जाती है।

तिब्बत जैसा मुद्दा चीन के प्रभाव में और ज्यादा गहरी दरारें डाल देता है। अगर दलाई लामा भी आक्रामक और हिंसक होते या तिब्बत का आंदोलन वैसा होता, तो चीन के लिए आसानी होती। दलाई लामा का सौम्य, आध्यात्मिक आभा मंडल और तिब्बत के आंदोलन की अहिंसकता चीन की आक्रामकता को और ज्यादा तीखा कर देती हैं। दलाई लामा जहां-जहां जाते हैं, वहां वह कोई चीन विरोधी बात न भी करें, तो भी उनकी उपस्थिति मात्र से चीन की छवि खराब होती है। ऐसे में चीन यह कोशिश कर रहा है कि दलाई लामा की उपस्थिति सामाजिक परिदृश्य पर कम से कम हो।

किसी देश का सत्तातंत्र लोकतांत्रिक न हो, एकाधिकारवादी हो, तो वह एक बात नहीं समझता कि कुछ बातें सौम्यता से बेहतर ढंग से मनवाई जा सकती हैं, आक्रामकता से नहीं। चीन की आक्रामकता दरअसल उसके ही विरुद्ध जाती है। भारत ने दबाव का माकूल जवाब देकर अच्छा किया, दबाव में आने का अर्थ था चीन की मांगों का बढ़ते जाना।

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