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पाकिस्तान की शिरकत जरूरी

पाकिस्तान दूसरे बॉन सम्मेलन में शामिल नहीं होगा, वहां अफगानिस्तान पर चर्चा होनी है। वजह साफ है। पिछले दिनों ही नाटो के हमले में 24 पाकिस्तानी फौजी मारे गए थे। इसके बाद लाहौर में पाकिस्तानी मंत्रिमंडल की बैठक हुई। तब इस्लामाबाद ने बॉन सम्मेलन में अपनी हिस्सेदारी पर पुनर्विचार के संकेत दिए थे।

एक सरकारी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘मंत्रिमंडल ने फैसला लिया है कि पाकिस्तान बॉन सम्मेलन से दूर रहेगा।’अगर पाकिस्तान ऐसा ही करता है, तो इससे सम्मेलन के नतीजे पर असर पड़ेगा। आखिर मसला अफगानिस्तान के भविष्य का है। इस मसले पर पाकिस्तान की क्षेत्रीय भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। उसकी गैर-मौजूदगी से बातचीत की मेज पर बड़ा अंतर आ जाएगा।

पाकिस्तानी हुकूमत ने अफगान समकक्ष से यह अनुरोध किया था कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी दूसरे मुल्क के खिलाफ नहीं होने दे। पर फैसला लेने के मामले में करजई प्रशासन की स्थिति दयनीय है। खासतौर पर तब, जब अफगानिस्तान में पश्चिम की ज्यादा दखलअंदाजी है।

हमने देखा है कि पिछले दस वर्षों के दौरान नाटो की कार्रवाई में कई दफे अफगानी फौजी और नागरिक मारे गए। लेकिन अफगानिस्तान की हुकूमत इन हमलों की सिर्फ भर्त्सना ही कर पाई। बहरहाल पाक से जो बन सकता था, उसने किया। उसने अफगानिस्तान-कराची लिंक सड़कों को बंद कर दिया है, ताकि नाटो फौज तक रसद सामग्री न पहुंचे। इसके अलावा अमेरिका बलूचिस्तान स्थित एयरबेस का ज्यादा दिनों तक इस्तेमाल नहीं कर पाएगा।

दरअसल, पाक चाहता है कि अफगानिस्तान में उसका असर कायम रहे। खासतौर पर वर्ष 2014 के बाद, जब विदेशी फौज अफगानिस्तान से हट जाएगी। तालिबान को शांति-वार्ता के लिए राजी करना अहम है। यह पाक के बिना मुमकिन नहीं होगा। बिना पाक को भरोसे में लिए अफगानिस्तान में अमन बहाली अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के लिए टेढ़ी खीर है। अगर पाकिस्तान जैसा क्षेत्रीय खिलाड़ी इससे अलग रहा तो बॉन सम्मेलन काफी हद तक अप्रासंगिक हो जाएगा। बेहतर यही होगा कि अब पश्चिमी मुल्क पाकिस्तान को मनाने की कोशिशें करें।
डेली आउटलुक, अफगानिस्तान

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