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थप्पड़ की गूंज

केंद्रीय खाद्य मंत्री शरद पवार को एक आदमी ने अपनी कुंठा के चलते थप्पड़ मारा। हालांकि मीडिया के सामने वह आदमी कह रहा था कि वह महंगाई बढ़ाने वाली सरकारी नीतियों से काफी परेशान है। महंगाई के लिए अकेले एक मंत्रालय को ही दोषी ठहराना उचित नहीं है। हमारे समाज में किसी प्रकार की हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए इस हमले की कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए और उस आदमी के खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए। यह भी सही है कि नेताओं के प्रति लोगों का झुकाव खत्म हो रहा है। यह धारणा तेजी से बनी है कि राजनेता समाज के उत्थान की बजाय जन विरोधी नीतियों को बढ़ावा देते हैं। एक समय था, जब इस देश के नागरिक लाल बहादुर शास्त्री, सरदार बल्लभभाई पटेल, इंदिरा गांधी को अपना आदर्श मानते थे। उस दौर की राजनीति में इतना भ्रष्टाचार भी नहीं था और न ही राजनेताओं के पास अकूत धन। लेकिन अब ऐसा नहीं है। राजनेताओं पर हमले की प्रवृति बढ़ रही है। जनता को अपनी भावनाओं पर काबू रखकर अपने गुस्से को वोट में बदलने की आदत डालनी होगी।
दिनेश गुप्त, पिलखुवा, उत्तर प्रदेश

बंटवारा और विकास
उत्तर प्रदेश की जमीन ने केंद्र को सात प्रधानमंत्री दिए हैं। लेकिन हमेशा से यह भूमि उपेक्षित रही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में लाखों मुकदमें लंबित हैं। लोग न्याय की आस में दर-दर भटक रहे हैं। कई और तरह की कठिनाइयां भी हैं। सभी को गिनाना मुमकिन भी नहीं है। लेकिन जरा सोचिए, दिल्ली में एमसीडी का विभाजन किया गया, इससे कई तरह की प्रशासनिक सुविधाएं आईं। लेकिन उत्तर प्रदेश में और अदालतों की स्थापना क्यों नहीं हुई? आबादी के बढ़ते बोझ के कारण बिजली, पानी, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की दीर्घकालिक योजनाएं नहीं बनाई गई। वैसे भी पांच साल में कोई भी सरकार इन सुविधाओं का जाल नहीं फैला सकती है। ऐसे में मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश के बंटवारे का प्रस्ताव सोच-समझकर दिया है। चार प्रदेश बनेंगे, तो सबकी तरक्की होगी।
लखीमचंद, कौशांबी, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

ऑटो चालकों के लिए
दिल्ली की सड़कों पर 45 हजार नए ऑटो रिक्शा जल्द ही दिखेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने इनके लिए परमिट जारी करने के आदेश दे दिए हैं। इससे उन गरीब शोषित ऑटो रिक्शा चलाने वालों का भला होगा, जो ऑटो चलाते हुए बूढ़े हो गए, लेकिन आज तक नई गाड़ी नहीं खरीद सके हैं। अब उनके पास एक मौका है कि वे ऑटो-रिक्शा माफियाओं के चंगुल से आजाद हो जाएं। हालांकि सरकार को इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बरतनी होगी।
चंद्रपाल जायसवाल, रोहिणी, दिल्ली

श्रमिकों पर राजनीति
दिल्ली और पंजाब में बिहार व उत्तर प्रदेश के श्रमिकों की संख्या में 26 फीसदी तक की कमी आई है। यह एक गैर-सरकारी संस्था का दावा है। इसी कारण श्रमिकों को लुभाने के लिए लुधियाना की औद्योगिक इकाइयां बाहर के श्रमिकों को मुफ्त साइकिल और मोबाइल उपलब्ध करा रहे हैं, ताकि श्रमिक अपने घर न जाएं। एक तरफ महाराष्ट्र में इन्हीं श्रमिकों की बढ़ोतरी पर राजनीतिक हो-हल्ला मच रहा है, तो पंजाब इन श्रमिकों को रोकने के लिए तरह-तरह की सुविधाएं दे रहा है। इसलिए क्षेत्रीय पार्टियों को गरीबों के प्रति इंसानियत की भाषा सीखनी चाहिए। जिस दिन बिहार और उत्तर प्रदेश संपन्न हो जाएंगे, पूरा देश श्रमिकों को ढूंढ़ता रहेगा।
राजेंद्र कुमार सिंह, आर्य अपार्टमेंट, सेक्टर-15, रोहिणी, दिल्ली

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