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भोपाल के लोग आज भी नहीं भुला पाते वो रात

मध्य प्रदेश की राजधानी में 27 वर्ष पहले हुई देश की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी के दुष्परिणामों के वैसे तो कई गवाह हैं लेकिन अकील अहमद एक ऐसा गवाह है, जो इस त्रासदी के कारण न सिर्फ बीमार, बेबस और लाचार हो गया बल्कि अब तो उसकी पत्नी भी उसे गुर्दे की बीमारी के साथ घुट-घुटकर मरने के लिए अकेला छोड़कर चली गई। आलम यह है कि कभी पूरी तरह से स्वस्थ रहने वाला नौजवान अकील अपाहिज हो गया और दूसरों की लाठी बनने की उम्र में उसे खुद लाठी का सहारा लेना पड़ रहा है।

भोपाल के लिए तीन-चार दिसम्बर, 1984 की रात कहर बन कर आई थी। इस रात यूनियन कार्बाइड संयंत्र से रिसी विषैली गैस ने हजारों लोगों की जिंदगी निगल ली थी और लाखों लोगों को मौत के मुहाने पर लाकर छोड़ दिया था। इस हादसे के दुष्प्रभाव आज भी नजर आते हैं।

निजामुद्दीन कालोनी में रहने वाला 30 वर्षीय अकील अहमद हादसे के वक्त बमुश्किल तीन वर्ष का था। जैसे-जैसे उम्र बढ़ी उसे बीमारियों ने घेरना शुरू कर दिया। अकील बताता है कि वर्ष 2002-03 में उसके गुर्दा रोगी होने का खुलासा हुआ। उसने इलाज शुरू कराया लेकिन सरकार की ओर से उसे मदद नहीं मिली। मुआवजे के तौर पर उसे अब तक सिर्फ दो किस्तों में 50 हजार रुपये मिले हैं।

अकील बताता है कि उसके दोनों गुर्दे खराब हो चले हैं। हाल यह है कि उसे सप्ताह में दो से तीन बार डायलिसिस कराना होता है। एक बार डायलिसिस कराने पर कम से कम हजार रुपये का खर्च आता है। गैस पीड़ितों के लिए स्थापित भोपाल मेमोरियल अस्पताल में पर्याप्त सुविधा नहीं मिल पाने के कारण उसे निजी चिकित्सालयों का रुख करना पड़ा।

निजी चिकित्सालयों में इलाज कराने के लिए अकील की पहले परिवार ने मदद की। जब परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ी तो उसने रिश्तेदार व परिचितों से कर्ज लिया। कर्ज इतना बढ़ गया कि उसे नजरें चुराते घूमना पड़ रहा है। गुर्दा की बीमारी के चलते एक पैर भी कमजोर हो गया है। हाल यह है कि उसे लाठी लेकर चलना पड़ता है।

अकील बताता है कि बीमारी इतनी बढ़ गई कि उसके इलाज के लिए राशि कम पड़ने लगी। बढ़ती बीमारी के बीच उसकी पत्नी भी उसे छोड़कर चली गई। अब वह अपने को निहायत अकेला महसूस करने लगा है। उसे ऐसा लगता है मानो वह जीते जी मर गया है। गैस पीड़ितों की लड़ाई लड़ने वाले अब्दुल जब्बार कहते हैं कि वर्तमान में चार से पांच हजार गुर्दा पीड़ित हैं। इनके उपचार की न तो समुचित व्यवस्था है और न ही उन्हें आर्थिक मदद मिल रही है। ये मरीज काम करने लायक बचे नहीं हैं और उनके लिए जीवन चलाना भी मुश्किल हो चुका है। राज्य व केंद्र सरकार का रवैया गैस पीड़ितों के प्रति अच्छा नहीं है।

जब्बार बताते हैं कि गुर्दा पीड़ित अस्पतालों के चक्कर लगाते-लगाते थक जाते हैं और कई तो दुनिया ही छोड़ देते हैं, मगर उन्हें उपचार नहीं मिलता है। वी.के. जैन भी ऐसे ही एक व्यक्ति थे जो विदिशा से इलाज कराने भोपाल आते थे मगर हर बार निराश होकर लौट जाते थे। उन्हें उपचार नहीं मिला और एक दिन वह दुनिया ही छोड़ गए। 

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