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झाविमो विधायक दल नेता ने मांगा जवाब

रांची, हिन्दुस्तान ब्यूरो। झाविमो विधायक दल नेता प्रदीप यादव ने ऊर्जा विभाग की कार्य प्रणाली पर सवाल खड़ा करते हुए यह जानना चाहा है कि सरकार बिजली ट्रांसमिशन लाइन के काम को नौ महीने से क्यों लटका कर रखी है? सरकार यह काम खुली निविदा बुलाकर क्यों नहीं आवंटित कर देती है।

इस काम को पीजीसीआइएल (पावर ग्रिड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया) को ही मनोनयन के आधार पर देने को आमादा क्यों हैं? तत्कालीन मुख्य सचिव की आपत्ति यादव ने सरकार के फैसलों में हुए परिवर्तन का खुलासा करते हुए कहा कि भारत सरकार द्वारा ग्रामीण विद्युतीकरण के तहत लगभग 2600 करोड़ रुपए झारखंड की बिजली संचार व्यवस्था (ट्रांसमिशन लाइन)को दुरुस्त करने के लिए 2010 में आवंटित किया गया था।

पिछले अक्टूबर में बिजली बोर्ड के तत्कालीन चेयरमैन शिव बसंत ने सरकार से ट्रांसमिशन के इस काम को राज्य बिजली बोर्ड की बजाए पीजीसीआइएल से कराने की अनुमति मांगी थी। लेकिन तत्कालीन मुख्य सचिव अशोक कुमार सिंह ने बोर्ड चेयरमैन के इस प्रस्ताव पर आपत्ति जतायी और सुझाव दिया था कि इस कार्य का आवंटन खुली निविदा निकालकर किया जाए। काम की बेहतरी के लिए सरकार एनटीपीसी के कुछ विशेषज्ञ इंजीनियरों की डेप्यूटशन के आधार पर सेवा ले सकती है।

मुख्यमंत्री की बोर्ड से काम कराने की सहमति : यादव ने बताया कि सीएस के इस सुझाव पर 11-10-2010 को मुख्यमंत्री सह विभागीय मंत्री (ऊर्जा) ने भी अपनी सहमति व्यक्त कर दी। उन्होंने भी इस काम को बिजली बोर्ड से कराने की सहमति जतायी।

सीवीसी की आपत्ति : प्रदीप यादव के मुताबिक मुख्यमंत्री सह विभागीय मंत्री (ऊर्जा) ने अचानक 30-11-2010 को केंद्रीय ऊर्जा मंत्री को पत्र लिखा कि राज्य सरकार बिजली ट्रांसमिशन का काम पीजीसीआइएल से कराना चाहती है। उन्होंने कहा कि पीजीसीआइएल भले ही भारत सरकार की एजेंसी है, लेकिन सीवीसी को कई बार यह शिकायत मिली है कि सरकारी कंपनी के नाम पर काम लेकर पीजीसीआइएल अपनी चहेती कंपनियों को काम दे देती है। सीवीसी का निर्देश है कि ऐसे काम खुली निविदा कर आवंटित किए जाने चाहिए।

वित्त विभाग का सुझाव व सीएम का निदेश : यादव ने बताया कि 24 मार्च 2011 को ऊर्जा विभाग के इस प्रस्ताव पर आपत्ति जतायी और सुझाव दिया कि खुली निविदा कर यह काम आवंटित करना अच्छा होगा। साथ ही विभाग ने यह फाइल उसी दिन लौटा दी। इस पर प्रभारी ऊर्जा मंत्री सह मुख्यमंत्री वित्त विभाग की टिप्पणी को गंभीर बताते हुए निदेश दिया कि किसी दूसरे विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए। झाविमो विधायक दल नेता ने सवाल किया कि सारे प्रकरण को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री सह ऊर्जा विभाग के प्रभारी मंत्री से यह जानना चाहता हूं कि ट्रांसमिशन के क्षेत्र में कई कंपनियां देश में काम करती हैं, तब भी सरकार पीजीसीआइएल को ही काम देने की रट क्यों लगाए हुए है? क्या कोई दूसरी कंपनी झारखंड में आकर काम नहीं करना चाहती है या पीजीसीआइएल कोई विशेष लाभ देनेवाली है? क्यों नहीं सरकार निविदा निकालकर कंपनियों को आमंत्रित करती है?

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के निर्देश के नौ महीने बाद भी ऊर्जा विभाग ने कौन सा दूसरे विक ल्प पर काम किया, जबकि निविदा की प्रक्रिया होती तो यह एक महीने में पूरी कर ली जाती। क्या सरकार पीजीसीआएल को 11 प्रतिशत पर काम देकर खजाने का ज्यादा पैसा नहीं देगी, जबकि दूसरी अच्छी कंपनियां सात-आठ फीसदी पर यही काम कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जी को इस तथ्य का खुलासा करना चाहिए।

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